Devi kavach aol

॥अथ श्री देव्याः कवचम ्॥
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋष िः, अनुष्टुप्छन्दिः,
चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, ददग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थेसप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपेषवननयोगिः।
ॐ नमश्‍चण्ण्डकायै॥
माकक ण्डेय उवाच
ॐ यद‍गुह्यंपरमंलोके सवकरक्षाकरं नणृ ाम।्
यन्न कस्यचचदाख्यातंतन्मेब्रूदि षपतामि॥१॥
ब्रह्मोवयच
अण्स्त गुह्यतमंषवप्र सवकभतू ोपकारकम।्
देव्यास्तुकवचं पुण्यंतच्छृणुष्व मिामुने॥२॥
प्रर्थमं शैलपुत्री च दषवतीयंब्रह्मचाररणी।
ततृ ीयं चन्रघण्टेनत कूष्माण्डेनत चतुर्थककम्॥३॥
पञ्चमं स्कन्दमातेनत ष्ठं कात्यायनीनत च।
सप्तमंकालरात्रीनत मिागौरीनत चाष्टमम्॥४॥
नवमंससदचधदात्री च नवदगु ाकिः प्रकीनतकतािः।
उक्तान्येतानन नामानन ब्रह्मणैव मिात्मना॥५॥
अण्ग्नना दह्यमानस्तुशत्रुमध्येगतो रणे।
षव मेदगु कमेचैव भयाताकिः शरणंगतािः॥६॥
न ते ांजायतेककंचचदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यासम शोकदिःुखभयंन दि॥७॥
यैस्तुभक्त्या स्मतृ ा नूनंते ां वदृचधिः प्रजायते।
येत्वां स्मरण्न्त देवेसश रक्षसेतान्न संशयिः॥८॥
प्रेतसंस्र्था तुचामुण्डा वारािी मदि ासना।
ऐन्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥
मािेश्‍वरी व ृारुढा कौमारी सशखखवािना।
लक्षमीिः पदमासना देवी पदमिस्ता िररषप्रया॥१०॥
श्‍वेतरुपधरा देवी ईश्‍वरी व ृ वािना।
ब्राह्मी िंससमारुढा सवाकभरणभूष ता॥११॥
इत्येता मातरिः सवाकिः सवकयोगसमण्न्वतािः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोसभतािः॥१२॥
दृश्यन्तेरर्थमारुढा देव्यिः क्रोधसमाकुलािः।
शङ्खं चक्रं गदां शण्क्तं िलं च मुसलायुधम॥् १३॥
खेटकं तोमरं चैव परशुंपाशमेव च।
कुन्तायुधंत्रत्रशूलं च शाङ्कगमायुधमुत्तमम॥् १४॥

दैत्यानां देिनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्र्थं देवानां च दिताय वै॥१५॥
नमस्तेऽस्तुमिारौरेमिाघोरपराक्रमे।
मिाबलेमिोत्सािेमिाभयषवनासशनन॥१६॥
त्रादि मां देषव दष्ुप्रेक्षयेशत्रूणां भयवचधकनन।
प्राच्यां रक्षतुमामैन्री आग्नेय्यामण्ग्नदेवता॥१७॥
दक्षक्षणेऽवतुवारािी नैऋक त्यां खड्गधाररणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद वायव्यां मगृ वादिनी॥१८॥
उदीच्यांपातुकौमारी ऐशान्यांशूलधाररणी।
ऊध्वंब्रह्माखण मेरक्षेदधस्ताद वैष्णवी तर्था॥१९॥
एवं दश ददशो रक्षेच्चामुण्डा शववािना।
जया मेचाग्रतिः पातुषवजया पातुपष्ृठतिः॥२०॥
अण्जता वामपाश्वेतुदक्षक्षणेचापराण्जता।
सशखामुदयोनतनन रक्षेदमु ा मूण्ध्नकव्यवण्स्र्थता॥२१॥
मालाधरी ललाटेच भ्रुवौ रक्षेद यशण्स्वनी।
त्रत्रनेत्रा च भ्रुवोमकध्येयमघण्टा च नाससके ॥२२॥
शङ्खखनी चक्षु ोमकध्येश्रोत्रयोदकवारवाससनी।
कपोलौ कासलका रक्षेत्कणकमूलेतुशांकरी॥२३॥
नाससकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठेच चचचकका।
अधरेचामतृ कला ण्जह्वायां च सरस्वती॥२४॥
दन्तान्रक्षतुकौमारी कण्ठदेशेतुचण्ण्डका।
घण्ण्टकांचचत्रघण्टा च मिामाया च तालुके ॥२५॥
कामाक्षी चचबुकं रक्षेद वाचं मेसवकमङ्गला।
ग्रीवायां भरकाली च पष्ृठवंशेधनुधकरी॥२६॥
नीलग्रीवा बदििःकण्ठेनसलकांनलकूबरी।
स्कन्धयोिः खङ्ङ्‍गनी रक्षेद बािूमेवज्रधाररणी॥२७॥
िस्तयोदकण्ण्डनी रक्षेदण्म्बका चाङ्गुली ुच।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥२८॥
स्तनौ रक्षेन्मिादेवी मनिः शोकषवनासशनी।
हृदयेलसलता देवी उदरेशूलधाररणी॥२९॥
नाभौ च कासमनी रक्षेद गुह्यंगुह्येश्वरी तर्था।
पूतना कासमका मेढ्रं गुदेमदि वादिनी ॥३०॥
कटयां भगवती रक्षेज्जानुनी षवन्ध्यवाससनी।
जङ्घेमिाबला रक्षेत्सवककामप्रदानयनी ॥३१॥
गुल्फयोनाकरससिं ी च पादपष्ृठेतुतैजसी।
पादाङ्गुली ुश्री रक्षेत्पादाधस्तलवाससनी॥३२॥

नखान्दंष्राकराली च के शांश्‍चैवोध्वकके सशनी।
रोमकूप े ुकौबेरी त्वचंवागीश्‍वरी तर्था॥३३॥
रक्तमज्जावसामांसान्यण्स्र्थमेदांसस पावकती।
अन्त्राखण कालरात्रत्रश्‍च षपत्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥
पदमावती पदमकोशेकफे चूडामखणस्तर्था।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेदया सवकसंचध ु॥३५॥
शुक्रं ब्रह्माखण मेरक्षेच्छायांछत्रेश्‍वरी तर्था।
अिंकारं मनो बुदचधंरक्षेन्मेधमकधाररणी॥३६॥
प्राणापानौ तर्था व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रिस्ता च मेरक्षेत्प्राणंकल्याणशोभना॥३७॥
रसेरुपेच गन्धेच शब्देस्पशेच योचगनी।
सत्त्वं रजस्तमश्‍चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥
आयूरक्षतुवारािी धमंरक्षतुवैष्णवी।
यशिः कीनतंच लक्षमींच धनंषवदयां च चकक्रणी॥३९॥
गोत्रसमन्राखण मेरक्षेत्पशून्मेरक्ष चण्ण्डके ।
पुत्रान्रक्षेन्मिालक्षमीभाकयांरक्षतुभैरवी॥४०॥
पन्र्थानं सुपर्था रक्षेन्मागंक्षेमकरी तर्था।
राजदवारेमिालक्षमीषवकजया सवकतिः ण्स्र्थता॥४१॥
रक्षािीनंतुयत्स्र्थानंवण्जकतंकवचेन तु।
तत्सवंरक्ष मेदेषव जयन्ती पापनासशनी॥४२॥
पदमेकं न गच्छेत्तुयदीच्छेच्छुभमात्मनिः।
कवचेनावतृ ो ननत्यंयत्र यत्रैव गच्छनत॥४३॥
तत्र तत्रार्थकलाभश्‍च षवजयिः सावककासमकिः।
यंयंचचन्तयतेकामंतंतंप्राप्नोनत ननण्श्‍चतम्।
परमैश्‍वयकमतुलंप्राप्स्यतेभूतलेपमु ान॥् ४४॥
ननभकयो जायतेमत्यकिः संग्रामेष्वपराण्जतिः।
त्रैलोक्येतुभवेत्पूज्यिः कवचेनावतृ िः पुमान॥् ४५॥
इदं तुदेव्यािः कवचं देवानामषप दलु कभम्।
यिः पठेत्प्रयतो ननत्यंत्रत्रसन्ध्यं श्रदधयाण्न्वतिः॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराण्जतिः।
जीवेद व कशतंसाग्रमपमत्ृयुषववण्जकतिः। ४७॥
नश्यण्न्त व्याधयिः सवेलूताषवस्फोटकादयिः।
स्र्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रत्रमं चाषप यदषव म्॥४८॥
असभचाराखण सवाकखण मन्त्रयन्त्राखण भूतले।
भूचरािः खेचराश्‍चैव जलजाश्‍चोपदेसशकािः॥४९॥

सिजा कुलजा माला डाककनी शाककनी तर्था।
अन्तररक्षचरा घोरा डाककन्यश्‍च मिाबलािः॥५०॥
ग्रिभूतषपशाचाश्च यक्षगन्धवकराक्षसािः।
ब्रह्मराक्षसवेतालािः कूष्माण्डा भैरवादयिः ॥५१॥
नश्यण्न्त दशकनात्तस्य कवचेहृदद संण्स्र्थते।
मानोन्ननतभकवेद राज्ञस्तेजोवदृचधकरं परम्॥५२॥
यशसा वधकतेसोऽषप कीनतमक ण्ण्डतभूतले।
जपेत्सप्तशतींचण्डींकृत्वा तुकवचंपरुा॥५३॥
यावदभूमण्डलं धत्तेसशैलवनकाननम्।
तावषत्तष्ठनत मेददन्यां संतनतिः पुत्रपौत्रत्रकी॥५४॥
देिान्तेपरमंस्र्थानंयत्सुरैरषप दलु कभम।्
प्राप्नोनत पुरु ो ननत्यं मिामायाप्रसादतिः॥५५॥
लभतेपरमं रुपंसशवेन सि मोदते॥ॐ॥५६॥
इनत देव्यािः कवचं सम्पूणकम

 

What is Makar Sankranti

_*-Vitamin D is made by the body with sunlight.*_
_*-Sesame seeds (til) have the highest calcium (975mg per 100g). Milk has 125mg only.*_
_*-the body is capable of storing vitamin D up to a year, and use the reserves.*_
_*-lastly, the body is capable of getting its viatmin D reserves full with 3 full days of sunlight.*_
_*-the best quality of sunlight is end of winter & beginning of summer.*_

_*Now join the dots, and see how wise our sages were of ancient India. They created a festival of flying kites, Makar Sankranti where by our kids get excited to go in the open, under direct sunlight, throughout the day starting from early morning. And their mothers feed them homemade TIL Laddoos.*_

_*Are we not a fantastic culture*_

*” _Wish you all a Very Happy Makar Sankrant_ “* 💐💐💐💐

Krashi billo ki aaad may bole shivraj…chauthi paari may tufaani hoga raajkaaj…article by Kaushal kishore chaturvediji

कृषि बिलों की आड़ में बोले शिवराज…चौथी पारी में तूफ़ानी होगा राजकाज …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चौथी पारी अब कठोर फैसलों से सराबोर रहेगी। मंगलवार को भेल दशहरा मैदान में मुख्यमंत्री शिवराज ने यह संकेत दे दिए। वे अलग ही अंदाज़ में नज़र आए और उन्होंने साफ़ कर दिया कि यह पारी तूफ़ानी होने वाली है।चौथी पारी में पिछली तीन पारियों से आगे बढ़कर पिच पर 20-20 क्रिकेट मैच के फ़ॉर्म में धुआँधार बल्लेबाज़ी का उन्होंने आगाज़ कर दिया है।और अब मैदान में न तो उनके क़दम ही थमने वाले हैं और रन बनाने में भी नए-नए रिकॉर्ड बनाने का उनका पूरा इरादा है। तो उन्होंने यह भी साफ़ कर दिया कि विकेट लेने में भी वह पीछे नहीं हटेंगे, चाहे प्रदेश में माफ़ियाओं की बात हो या फिर गुंडों का सफ़ाया करने का टारगेट हो। तो कहीं न कहीं इस मामले में अपरोक्ष रूप से उन्होंने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को भी आगाह कर ही दिया है कि… चौथी पारी है समझने वाले समझ लें कि शिवराज जहाँ सज्जनों के लिए फूल से भी कोमल हैं तो दुर्जनों के लिए वज्र से भी कठोर हैं।अब शिवराज, भाजपा सरकार और संगठन के लिए दुर्जनों में कौन-कौन आता है… यह समझने वाले समझें और हो सके तो सज्जन बनने की दिशा में कदम बढ़ाने का मन भी बना लें वरना खैर नहीं है यह शिवराज ने जता दिया है।तो उन्होंने यह भी जता दिया कि विष्णु उनके लिए और भाजपा के लिए लकी है और चौथी पारी में विष्णु संग शिवराज राजकाज के मामले में सख़्त रहेंगे और कोई समझौता करने के मूड में नहीं है।यानी विष्णु जहाँ भाजपा संगठन के फलने फूलने के साथ साथ सरकार को संबल प्रदान करेंगे तो शिव अपने कोमल और कठोर रूप में सरकार के फ़ैसलों से प्रदेश को संजीवनी देंगे।

जवाब नहीं शिवराज का …
एक कुशल वक्ता के रूप में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कोई सानी नहीं है। कृषि बिलों पर किसान कार्यकर्ताओं को समझाइश देते हुए उन्होंने साफ़ कर दिया और किसानों के हाथ उठवा कर यह वादा भी ले लिया कि वह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तीनों कृषि बिलों के साथ हैं।और शिवराज जैसे ट्रेनर से ट्रेन्ड होकर किसान कार्यकर्ता किसानों को कृषि बिलों की जो घुट्टी पिलाएंगे, उसके बाद देश के दिल मध्य प्रदेश के किसानों के दिल से यही आवाज़ निकलेगी की इन तीन कृषि बिलों के बिना किसान का उद्धार होने वाला नहीं है।समझाने का तरीक़ा भी अनूठा कि अंगूठा छाप किसान भी मुँह जुबानी बोलने लगे कि कृषि बिलों में क्या- क्या है? पहला कृषि बिल कि किसान सिर्फ़ मंडियों में अपनी उपज बेचने को मजबूर न रहे और आढ़तियों की मनमानी का ग़ुलाम ना बना रहे। इसके लिए वह अपनी उपज जिसको चाहे जहाँ चाहे अपनी पसंद से दे सके और ज़्यादा से ज़्यादा मूल्य में बेचने की आज़ादी पा सकें। फिर शिवराज का पूछने का अंदाज़ कि इसमें किसानों का हित है या नहीं तो भीड़ में से आवाज़ आनी शुरू होती है कि किसानों का हित है। और मंच से शिवराज चिल्लाते हैं कि मीडिया वालों आज इन किसानों की तरफ़ कैमरा मोड़ दो। मुझे तो रोज़ रोज़ दिखाते हो आज इन्हें ही दिखा दो। फिर दूसरा कृषि बिल कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग…बताओ इसमें क्या बुराई है कि कोई खेत में फ़सल बोने के समय ही किसान से समझौता कर ले कि फ़सल को 5000 रुपये प्रति क्विंटल ख़रीदेगा और किसान राज़ी है कि उसे मुनाफ़ा हो रहा है तो वह समझौता करने के लिए क्यों स्वतंत्र न हो? और कोई अगर बाद में ख़रीदने से मुकर गया तो उदाहरण भी है पिपरिया एसडीएम का, उन्होंने समझौता करने वाले को सम्मन जारी कर फ़सल ख़रीदने पर मजबूर कर दिया। अब बताओ किसान भाईयों इसमें क्या बुराई है? क्या यह किसान के हित में नहीं है? किसान भाईयों हाथ उठाकर बताओ … फिर भीड़ से आवाज़ें आती हैं और शिवराज बोल पड़ते हैं कि अरे यार मीडिया वालों कैमरे किसानों की तरफ़ मोड़ दो आज। फिर तीसरा बिल कि ख़रीदने पर पाबंदी ख़त्म क्यों न हो? स्टॉक लिमिट ख़त्म करने के पीछे मोदी की यह सोच है कि ज़्यादा से ज़्यादा क़ीमत में किसान की अधिक से अधिक फ़सल बिक सके…यानी कि फ़सल ख़रीदने की पाबंदी से आज़ादी। फिर किसानों की भीड़ से आह्वान और फिर मीडिया से अपील कि मोदी और कृषि बिलों का समर्थन करने वाले किसानों को दिखाएं। और मुट्ठी बांधकर भारत माता की जय के साथ ही शिवराज सिंह चौहान किसान कार्यकर्ताओं को और किसानों को पूरी तरह से ट्रेंड करने में सफल हो जाते हैं।शिवराज का भाषण सुनकर मंच पर बैठे प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा मंद-मंद मुस्कराते हुए गौरवान्वित दिख रहे हैं तो मंचासीन सभी मंत्री, पूर्व मंत्री, विधायक, सांसद, पदाधिकारी, शिवराज की समझाने की इस अदा के न केवल क़ायल दिखाई देते हैं बल्कि उनके सामने पूरी तरह से नत मस्तक दिखाई देते हैं। कृषि बिलों को समझाने के साथ ही मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज यह भी भरोसा दिलाते हैं कि प्रदेश की एक भी मंडी बंद नहीं होगी और किसान जहाँ चाहेगा वहाँ अपनी फ़सल बेचेगा…चाहे तो मंडी के अंदर या मंडी के बाहर।

तुकबंदी भी…हदबंदी भी-
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जहाँ तुकबंदी के ज़रिए भी ख़ूब समझाइश दी तो विरोधियों को हद में रहने की चेतावनी भी देने से नहीं चूके। शिवराज कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार कैसी है अगर तुकबंदी में कहूं तो *हर बच्चे की पढ़ाई, हर बीमार को दवाई, हर खेत को सिंचाई, हर गरीब मजदूर की भलाई, हर युवा के हाथ में कमाई, हर नारी नारायणी कहलाई, गांव शहर घर घर में सफाई, ना कोई ढोंग ना कोई ढिलाई और गुंडों की ठुकाई।*
विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए साफ़ कर दिया कि मैदान में मोदी जी का मुकाबला नहीं हो सकता इसलिए गाली दे रहे हो। जहां देखो वहां हारते जा रहे हो, मैदान साफ होता जा रहा है। किसानों के नाम पर मोदी को गाली दे रहे हो यानी कि विपक्ष अपनी हद में रहे अब वह किसी क़ाबिल नहीं रहा।मैदान में वह मोदी का मुक़ाबला नहीं कर सकता तो मैदान-मंच पर शिवराज का मुक़ाबला करने की हिम्मत भी विपक्ष में नहीं है।
मोदी को समर्थन देने के लिए मध्य प्रदेश सरकार और भाजपा संगठन का यह मेगा शो जहाँ निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री के मन में शिव-विष्णु के प्रति स्नेह-प्रेम बढ़ाएगा तो निश्चित तौर से शिवराज की चौथी पारी पर कहीं न कहीं मोदी की निगाह भी रहेगी। उत्तर प्रदेश में अगर मुख्यमंत्री योगी 20-20 की तूफ़ानी पारी खेल सकते हैं तो मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज की चौथी पारी भी दूसरे मुख्यमंत्रियों पर भारी पढ़ने वाली है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाव-भाव शायद यही संदेश दे रहे हैं।

Deshhit par sarvsammati se faisle kab liye jayenge….article by Kaushal kishore chaturvediji

देशहित पर सर्वसहमति से फ़ैसले कब लिए जाएँगे ?

कौशल किशोर चतुर्वेदी

किसानों के मुद्दे पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं तो किसान सरकार के विरोध में दिल्ली के चारों तरफ़ डेरा डाले हुए हैं। मुद्दा है किसानों से संबंधित तीन बिलों का। सरकार इन्हें किसान हितैषी बता रही है तो विपक्ष इन्हें किसानों को बर्बाद करने वाला बिल बता रहा है। तो विरोध करने वाले किसानों की माँग भी है कि किसानों से संबंधित ये तीनों क़ानून रद्द किए जाएँ।
मुद्दा यह भी है कि क्या यह किसान किसान हैं या फिर किसी दल समर्थित और किसी विचारधारा समर्थित व सरकार के विरोध में उतारे गए कथित किसान?
सवाल यह भी है कि राष्ट्र हित के मुद्दों पर भी पक्ष-विपक्ष का अंतर हमारी राष्ट्रीय राजनीति में कभी ख़त्म होता नज़र क्यों नहीं आता? किसानों को लेकर चाहे सरकार की सफ़ाई हो या विपक्ष का विरोध और चाहे किसान और उनके समर्थक….. सब कुछ बेचैन करने वाला है। तो बेचैन करने वाली स्थिति यह भी है कि विपक्ष केवल विरोध करने का माध्यम बन कर ही अपनी सार्थकता सिद्ध करने में क्यों जुटा रहता है। यूपीए-2 सरकार के समय के दो वायरल वीडियो भी यही साबित कर रहे हैं …तो आज का राजनीतिक परिदृश्य भी इस पर मुहर लगा रहा है। सवाल यह है कि भारत की राजनीति में चाहे किसानों का मुद्दा हो, नौजवानों का हो या फिर सीमा पर तैनात जवानों का? क्या राष्ट्र हित के मुद्दों पर सर्वसहमति से कभी भी फ़ैसले नहीं लिए जाएंगे? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चिंता से संबंधित वायरल हो रहा वीडियो, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की वायरल फ़ोटो के साथ उनके हवाले से लिखा गया संदेश सभी राष्ट्रहित में हैं। आइए पढ़ते हैं इन सभी वायरल वीडियो के भाव और यही उम्मीद करते हैं कि राष्ट्रहित में पक्ष विपक्ष का अंतर ख़त्म हो और सर्वसहमति से फ़ैसले भी हो सके।

पहला वीडियो-
सुषमा स्वराज संसद में बोल रही हैं, मीरा कुमार आसंदी पर विराजमान हैं और सुषमा के ठीक पीछे अनंत कुमार बैठे हैं।

सुषमा कहती हैं-
ग्रामीण अर्थव्यवस्था ये कहती है कि आपके ये बैंकों के एटीएम तो आज आए हैं।आढ़ती उस किसान का पारंपरिक एटीएम है।
(पीछे से सांसदों की आवाज आती है बहुत अच्छे-बहुत अच्छे।)
किसान को बेटी की शादी करनी हो या बुआ का भात भरना हो,बहन का छूछक भरना हो बच्चे की पढ़ाई करानी हो बाप की दवाई करानी हो, सिर पर साफ़ा बाँधता है और सीधा मंडी में आढ़ती के पास जाकर खड़ा हो जाता है।वह उसे सिर्फ़ विश्वास पर पैसा देता है क्योंकि उसे मालूम है कि जब फ़सल आएगी तब वह बैल गाड़ी में भरकर या ट्रैक्टर ट्रॉली में भरकर लेकर आएगा और वह उसे बेचकर पैसा वसूल लेगा। मैं पूछना चाहती हूँ कि क्या वालमार्ट या टेस्को उसे उधार देगा? क्या उसमें संवेदना होगी बेटी की शादी या बहन का भात भरने की? उसे तो धोती वाले और साफ़ा वाले किसान से बदबू आएगी।
(पीछे से आवाज़ें आती हैं बिल्कुल आएगी)
और कौन डायरेक्ट बात कर सकेगा। कौन किसान से सीधा ख़रीदेगा और जो नई एजेंसियाँ खड़ी होंगीं वह नए बिचौलिए खड़े हो जाएँगे। इसलिए यह बात कहना कि बिचौलिए को आप खत्म कर देंगे या मिडिलमैन को आप खत्म कर देंगे, सिरे से ग़लत है।

दूसरा वीडियो –
कपिल सिब्बल बोल रहे हैं और आसंदी पर मीरा कुमार ही विराजमान हैं। किसानों के मुद्दे पर सफ़ाई जारी है।

कपिल सिब्बल बोलते हैं-
जब किसान बोता है और बेचने जाता है तो उसके पास मार्केट नहीं है बेचने के लिए। उसे मालूम नहीं है किस मार्केट में जाना है। और जब मंडी जाता है तो पैंतीस-चालीस फ़ीसदी माल ख़राब हो जाता है। और आठ कमीशन एजेंट होते हैं बीच में। आठ कमीशन एजेंट यानि बिचौलिए। और मेरे पास स्टडी हैं कि ओपन मार्केट का 17 फ़ीसदी किसान को मिलता है बाक़ी बिचौलियों को चला जाता है। विपक्ष के नेता और विपक्षी दलों को यह तय करना है कि वो किसान के साथ हैं या बिचौलियों के साथ। यह तय कर लीजिए। पैसा समय पर मिलेगा, नक़द मिलेगा, कमीशन खत्म हो जाएगा। साथ में टेक्नोलॉजी मिलेगी, कब बोना है, कैसे बोना है, कितना पानी देना है कितनी खाद देनी है और श्योर बायर है, उसे एक बायर पक्का मिल गया। प्राइम एग्रीमेंट हो गया। आलू का दाम उसे बाज़ार में 3 रुपया मिलता है पेप्सिको उसे 5 रुपया 75 पैसा देती है। 2010-11 में बाजार में 3.80 से 5 रुपए तक और पेप्सिको देती है 6 रुपया। तो किसान को पैसा ज्यादा मिलता है समय पर मिलता है। आम किसान की हालत यह है कि उसे मालूम नहीं है कि किस मार्केट जाना है कहाँ महँगा बिकेगा, इस बीच उनकी 35-40 फ़ीसदी फ़सल ख़राब हो जाती है।

तीसरा वीडियो –
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 29 सितंबर 2020 का यह वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने दल विशेष पर भी निशाना साधा और दल से जुड़े परिवार विशेष पर भी।

प्रधानमंत्री मोदी का कहना है –
एक ऐसा दल, जिसके एक परिवार की चार-चार पीढ़ियाँ – जिसने देश पर राज किया। वह आज दूसरे के कंधों पर सवार होकर देशहित से जुड़े हर काम का विरोध करवाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है। ये किसान की आजादी का विरोध कर रहे हैं। जिन सामानों की उपकरणों की किसान पूजा करता है। उन्हें आग लगाकर ये लोग किसानों को अपमानित कर रहे हैं। इनकी काली कमाई का एक और ज़रिया समाप्त हो रहा है इसलिए इन्हें परेशानी है। साथियों ये लोग न किसान के साथ हैं न नौजवान के साथ और न ही देश के वीर जवान के साथ हैं। बरसों तक इन लोगों ने देश की सेनाओं को, देश की वायुसेना को सशक्त करने के लिए कुछ नहीं किया। वायुसेना कहती रही कि उसे आधुनिक लड़ाकू विमान चाहिए। लेकिन ये लोग वायुसेना की बात कभी नहीं सुनी नज़रअंदाज़ करते रहे। रफाल का विरोध, राममंदिर का विरोध पहले सुप्रीम कोर्ट में फिर भूमिपूजन का विरोध। बदलती हुई तारीख़ के साथ विरोध के लिए विरोध करने वाले यह लोग अप्रासंगिक होते जा रहे हैं।

अंत में वायरल फ़ोटो की सीख –
अटल जी की फ़ोटो वायरल हो रही है जिसके नीचे उन्हीं का हवाला देकर लिखा गया है –
जहाँ विरोध और विरोधियों को ग़द्दार मानने का भाव है, वहाँ लोकतंत्र समाप्त होता है और तानाशाही का उदय होता है।

यह सब पढ़ने के बाद आपका क्या सोचना है? ज़रूर किसी न किसी रूप में अपनी प्रतिक्रिया किसी न किसी प्लैटफ़ॉर्म पर ज़रूर व्यक्त करें ताकि राष्ट्र का हित हो सके। किसान हितैषी फैसलों पर तकरार न हो और राष्ट्र हितैषी मुद्दों पर राजनैतिक संग्राम न हो। साथ ही वह दिन देखने को मिले जब राष्ट्रहित के मुद्दों पर सर्वसहमति से फ़ैसले लिए जाने के साक्षी बनने का अवसर देशवासियों को मिले, फिर सरकार में कोई भी दल रहे और विपक्ष में कोई रहे…विपक्षी दल की मान्यता न भी हो तब भी राष्ट्रहित पर सब एक सुर में बोलें …।

Kisan sakaratmak ho manege baat…ya sarkar nakartmak ho karegi aaghat….

किसान सकारात्मक हो मानेंगे बात … या सरकार नकारात्मक हो करेगी आघात …!

कौशल किशोर चतुर्वेदी

केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच बैठकों का दौर जारी है लेकिन बात बन नहीं पा रही है। किसानों का हठ है कि तीनों कृषि क़ानून रद्द किए जाएं तो केंद्र सरकार का मानना है कि जिन बिन्दुओं पर संशय हैं उन पर बातचीत हो और सरकार संशोधन के ज़रिये किसानों को संतुष्ट करने पर सहमति बनाने को राज़ी है। मोदी नीत सरकार में अब तक यह नौबत नहीं आयी है कि कोई फ़ैसला लिया गया हो और सरकार ने दबाव में फ़ैसला वापस ले लिया हो।जहाँ तक किसानों की दिल्ली घेरने की चेतावनी की बात हो तो इस तरह की नादानी शायद किसानों को भारी पड़ सकती है। तानाशाही तो हमेशा सिर्फ़ सरकारों की ही चली है, सरकार के सामने जनता ने तानाशाही पूर्ण तरीक़े से पेश आने की जब-जब कोशिश की है…तब-तब उसे मुँह की ही खानी पड़ी है। वर्ष 2010 में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का उदाहरण ही ले लें। किसानों ने राजधानी की घेराबंदी की थी। कई दिन तक राजधानी किसानों की बंधक बन गई थी। सरकार ने बात भी की थी, समाधान का भरोसा भी दिलाया था लेकिन अचानक पुलिस और प्रशासन सक्रिय हुआ और किसानों को मुँह की खानी पड़ी थी और लाठी के दम पर ही किसानों की हठ पर सरकार ने निरंकुशता के साथ जीत हासिल कर ली थी। दिल्ली में भी अगर किसानों ने घेराबंदी की कोशिश की तब दिल्ली के बार्डर पर हज़ारों की संख्या में जमा हुए किसानों का नज़ारा भी 2010 के भोपाल में जमे किसानों की दुर्दशा से अलग नहीं होगा। पुलिस प्रशासन को जब फ़्री हैंड मिलता है तब वह जनता या किसानों को नाकों चने चबवाने में देर नहीं लगाते। दिल्ली में किसानों के जमावड़े और सरकारी रवैये में डर इतना ही है कि जनहानि न हो।अगर किसान उग्र होता है तो दिल्ली में जिस तरह के हालात हैं उसमें बलप्रयोग होने पर जनहानि की आशंका बलवती होती जा रही है।यह देश के लिए भी दुर्भाग्यपूर्ण होगा और किसानों के लिए भी अफ़सोस जनक होगा तो सरकार भी ख़ुद को माफ़ नहीं कर पाएगी।
किसानों की माँग है कि केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीनों क़ानून किसान विरोधी हैं। इन कानूनों को रद्द करने के अलावा किसान कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। केंद्र सरकार का मानना है कि क़ानूनों में वहाँ संशोधन को सरकार तैयार है जहाँ किसानों को लग रहा है कि क़ानून से नुक़सान है। पर सरकार क़ानून रद्द करने की माँग स्वीकार करने को राज़ी नहीं है। अब यह लड़ाई शेर और बकरी के जैसी हो गई है। यहाँ पर भी शेर सरकार है और किसानों की स्थिति बकरी के जैसी है। जब तक बातचीत जारी है तब तक ही किसान के पास ख़ैर मनाने का विकल्प है। जब सरकार ने मुँह फेरा तो मानो खैर नहीं रहेगी। बकरी कितना भी मिमियाए कि शेर उसकी जान लेकर ग़लत कर रहा है लेकिन जंगल के राजा की सेहत पर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।ठीक ऐसी ही स्थिति फ़िलहाल किसानों और केंद्र सरकार के बीच हो गई है। किसानों के सम्मान में सरकार बात करने को तैयार हुई है तो यह भी नहीं माना जा सकता वह पूरी तरह से समर्पण कर अपने फैसलों पर पूरी तरह से सवालिया निशान लगाने का मौक़ा देश या देश के किसानों को देगी। नोट बंदी और जीएसटी जैसे फ़ैसले देश के सामने हैं, पर सरकार ने ख़ुद को सही साबित किया और पहले से ज़्यादा सीटें जीतकर भाजपा ने केंद्र में वापसी भी की। ऐसे में अगर किसान सोच रहे हैं कि क़ानून रद्द होंगे तो शायद वह ग़लत भी साबित हो सकते हैं और इसका खामियाजा भी उन्हें उठाना पड़ सकता है। किसान चाहे पंजाब, हरियाणा का हो या उत्तरप्रदेश, बिहार का, गुजरात का हो या पश्चिम बंगाल का और कश्मीर का हो या तमिलनाडु का …सरकारों की सेहत पर इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। किसानों के पास एक ही विकल्प है कि वे सरकार के सुर में सुर मिलाने के लिए सकारात्मक रवैया अपनाने को मजबूरी में भी तैयार रहें वरना सरकार नकारात्मक रवैया अपनाते हुए किसानों को बलपूर्वक हटाने और दमन करने के लिए आघात करने पर मजबूर होने को तैयार है।

किसानों के मुताबिक़ पहले कृषि कानून के तहत केंद्र सरकार “एक देश, एक कृषि मार्किट” बनाने की बात कह रही है। पैन कार्ड धारक कोई भी व्यक्ति, कम्पनी, सुपर मार्केट किसी भी किसान का माल किसी भी जगह पर खरीद सकते हैं। किसानों का माल खरीदने वाले पैन कार्ड धारक व्यक्ति, कम्पनी या सुपर मार्केट को 3 दिन के अंदर किसानों के माल की पेमेंट करनी होगी। सामान खरीदने वाले व्यक्ति या कम्पनी और किसान के बीच विवाद होने पर एसडीएम इसका समाधान करेंगे। समाधान के लिए 30 दिन का समय दिया जाएगा, अगर बातचीत से समाधान नहीं हुआ तो एसडीएम द्वारा मामले की सुनवाई की जाएगी। फिर अपील और फिर 30 दिन में समाधान का प्रावधान। पर कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता।
दूसरे क़ानून के तहत आलू, प्याज़, दलहन, तिलहन व तेल के भंडारण पर लगी रोक को हटा लिया गया है। अब समझने की बात यह है कि हमारे देश में 85% लघु किसान हैं, किसानों के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है यानि यह क़ानून बड़ी कम्पनियों द्वारा कृषि उत्पादों की कालाबाज़ारी के लिए लाया गया है, ये कम्पनियाँ एवम सुपर मार्किट अपने बड़े-बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे एवम बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे।
तीसरा क़ानून सरकार द्वारा कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के विषय पर लागू किया गया है।इसके तहत कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाएगा जिसमें बड़ी- बड़ी कम्पनियाँ खेती करेंगी एवम किसान उसमें सिर्फ मजदूरी करेंगे। इस नए अध्यादेश के तहत किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन के रह जायेगा। इस अध्यादेश के जरिये केंद्र सरकार कृषि का पश्चिमी मॉडल हमारे किसानों पर थोपना चाहती है।

  1. तीन कृषि कानूनों को लेकर देश के किसान के मन में कुछ इसी तरह की आशंकाएं हैं।तो केंद्र सरकार का कहना है कि इन 3 कृषि अध्यादेशों से किसानों के लिए फ्री मार्किट की व्यवस्था बनाई जाएगी जिससे किसानों को लाभ होगा। पर किसानों के विरोध के बाद यदि केंद्र सरकार संशोधन के लिए राज़ी हुई है तो मतलब साफ़ है कहीं न कहीं कानूनों में खामियां हैं। कहीं न कहीं सरकार को यह मालूम है कि किसानों के लिए खेती को लाभ का धंधा बनाना उसके लिए संभव नहीं है इसलिए किसानों को खुले बाज़ार के हवाले कर दिया जाए। ताकि बाद में किसानों की बर्बादी पर मातम मनाने का ठेका भी किसानों के हिस्से में चला जाए। सरकार किसानों के मामलों से पूरी तरह से पल्ला झाड़ लेगी और समय समय पर व्यापारियों पर शिकंजा कस किसानों की सहानुभूति हासिल करती रहेगी।

congress ko bhi ratna hoga- chairevati mantra …jiske sahare bhajpa sadhti satta sangathan tantra……article by Kaushal kishore chaturvediji

कांग्रेस को भी रटना होगा चरैवेति-चरैवेति मंत्र… जिसके सहारे भाजपा साधती सत्ता- संगठन तंत्र

कौशल किशोर चतुर्वेदी

भाजपा के प्रशिक्षण वर्ग की प्रक्रिया मंडल स्तर पर शुरू हो चुकी है। मध्य प्रदेश में उपचुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भारतीय जनता पार्टी रुकी नहीं, थकी नहीं और सतत चलती जा रही है, बढती जा रही है। भाजपा में संगठन स्तर पर ‘चरैवेति-चरैवेति’ मंत्र पर अमल करते हुए मंडल स्तर पर प्रशिक्षण वर्ग की शुरुआत हो चुकी है। एक हज़ार से ज्यादा मंडलों में भाजपा कार्यकर्ताओं को पार्टी की रीति-नीति और विचारधारा से ओतप्रोत करने और आधुनिक डिजिटल मीडिया तक से रूबरू कराने और सरकार की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सघन प्रयास शुरु हुए है। प्रशिक्षण का महत्व क्या है? मिसरोद मंडल के कार्यकर्ताओं को बताते हुए विधायक कृष्णा ग़ौर ने बताया कि एक वर्ष की योजना बनानी हो तो पेड़ लगाओ, 25 वर्ष की योजना बनानी हो तो बाग-बग़ीचा लगाओ और 100 वर्ष की योजना बनानी हो तो प्रशिक्षण दो। प्रशिक्षण के ज़रिए कई पीढ़ियाँ रीति-नीति, विचारधारा में ढल जाती हैं जिसका फ़ायदा संगठन को सदियों तक मिलता है। चरैवेति-चरैवेति की इसी सोच और प्रशिक्षण के महत्व के चलते ही भाजपा संगठन स्तर पर मज़बूत है तो सत्ता के साथ बिना थके, बिना रुके कंधे से कंधा मिलाकर बढ़ती जा रही है। और लक्ष्य के प्रति समर्पण और कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम का ही नतीजा है कि भाजपा ने 5 साल की जगह मध्यप्रदेश में 15 महीने में ही न केवल सत्ता में वापसी की है बल्कि उपचुनावों में भी कांग्रेस को धूल चटाते हुए साबित कर दिया है कि भाजपा दुनिया का सबसे बड़ा राजनैतिक दल है तो उसके पीछे चरैवेति-चरैवेति मंत्र को आत्मसात किए कार्यकर्ताओं का ही बल है।

भाजपा के मंडल स्तर पर प्रशिक्षण की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश अध्यक्ष व सांसद विष्णुदत्त शर्मा ने मिसरोद मंडल के प्रशिक्षण वर्ग के उदघाटन सत्र को संबोधित किया।तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सीहोर जिले के शाहगंज मंडल को संबोधित किया। प्रदेश अध्यक्ष व सांसद विष्णुदत्त शर्मा ने प्रशिक्षण और कार्यकर्ता का महत्व बताया कि कार्यकर्ता पार्टी का चेहरा होता है, प्रवक्ता होता है। भविष्य में इन्हीं कार्यकर्ताओं में से नेतृत्व निकलकर आता है। प्रशिक्षण की बदौलत साधारण कार्यकर्ता भी शिखर तक पहुंच जाता है, यह बात हमारे नेताओं ने साबित की है। इसीलिए भारतीय जनता पार्टी में कार्यकर्ता निर्माण एक सतत प्रक्रिया है। पार्टी अपने विचार से कार्यकर्ताओं को अवगत करा सके, यही प्रशिक्षण का उद्देश्य है। प्रशिक्षण वर्ग में सीखी गई बातें हमें बहुत आगे तक ले जाती हैं। प्रत्येक कार्यकर्ता बूथ-बूथ तक अपनी राजनीतिक और सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वाह कर सके, इसके लिए प्रशिक्षण बेहद जरूरी है।
वैसे अगर भाजपा में देखा जाए तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हों या फिर प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा या मोदी-शाह की जोड़ी … सतत चलते-चलते ही सभी अपनी-अपनी मंज़िलों तक पहुँच गए और मंज़िल पर पहुंचने के बाद भी न तो रुके और न ही थके। संगठन की मज़बूती और सत्ता पर मज़बूत पकड़ इसी चरैवेति का ही प्रमाण है। प्रशिक्षण के ज़रिए जहाँ पंडित दीनदयाल उपाध्याय, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अटल बिहारी वाजपेयी को याद किया गया तो पंडित नेहरू की विफलता और धारा 370 हटाकर कश्मीर में भाजपा की सफलता का बखान भी कार्यकर्ताओं के बीच गर्व से किया गया। आगामी नगरीय निकाय चुनाव हों या फिर पंचायत चुनाव उपलब्धियों की यह घुट्टी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने के लिए और मैदान में फ़तह के लिए काफ़ी है।

  1. तो दूसरी तरफ़ प्रदेश में कांग्रेस संगठन सोया-सोया सा है। लगता है हार की निराशा नेताओं पर हावी है। थकान ने डेरा डाल रखा है, सब कुछ रुक सा गया है-थम सा गया है। कांग्रेस उपचुनावों में न तो अपनी 15 माह की उपलब्धियों को गिनाकर मतदाताओं को लुभा सकी। और न ही प्रदेश में लोकतंत्र की हत्या का आरोप साबित कर सत्ता में वापसी के सपने को साकार कर पाई।और अब हाथ पर हाथ रख शायद आगामी विधानसभा चुनावों तक विश्राम का मन बना चुकी है।फिर ऐन वक़्त पर गुटीय आधार पर टिकट वितरण की प्रक्रिया में जुटेगी, हालाँकि एक गुट कम हुआ है पर पूरी कांग्रेस कमजोर हुई है…उपचुनाव के परिणामों से यह साफ़ हो चुका है। यह तय है कि कांग्रेस इस बीच हुए पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव में हार का ठीकरा फोड़ने की वजहें भी सोते-सोते भी ढूँढ ही लेगी। पर यह बात सौ फ़ीसदी सच है कि कांग्रेस का उद्धार भी चरैवेति-चरैवेति मंत्र पर अमल के बिना नहीं होगा। विपक्ष के रूप में भी ज़िंदा रहना है तब भी चरैवेति-चरैवेति ही रटना होगा वरना संसद की तरह राज्यों में विधानसभाओं में भी कांग्रेस के हाथ से विपक्ष में बने रहने का सम्मान भी गुम होने का संशय बना रहेगा। यह भी तय है कि मध्यप्रदेश में कमलनाथ और दिग्विजय के बाद चरैवेति-चरैवेति के मंत्र पर अमल करने वाले युवाओं की टोली जब तक सक्रिय नहीं होगी…तब तक बिना रुके, बिना थके सत्ता को मुट्ठी में लाने का प्रयास फलीभूत नहीं होगा। क्योंकि चरैवेति-चरैवेति मंत्र ही भाजपा के लिए सत्ता-संगठन तंत्र को साधता है और इसी मंत्र को सिद्ध कर ही कोई दूसरा दल भी सत्ता से वनवास के दलदल से पार पा सकता है।

9 mahine baad hogi vidhansabha speaker ke hawale….taiyaar baithe hai mantri banne wale..article by Kaushal kishore chaturvediji

नौ माह बाद विधानसभा होगी स्पीकर के हवाले … तैयार बैठे हैं मंत्री बनने वाले …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

आख़िरकार अब यह तय हो गया है कि मध्‍यप्रदेश की पन्‍द्रहवीं विधानसभा का अष्टम् सत्र 28 दिसम्‍बर, 2020 से 30 दिसम्‍बर 2020 तक आहूत हो रहा है। विधानसभा सचिवालय द्वारा अधिसूचना जारी होने के बाद स्थिति पूरी तरह से साफ़ हो गई है। इस तीन दिवसीय सत्र में सदन की कुल 03 बैठकें होंगी, जिसमें महत्‍वपूर्ण शासकीय विधि विषयक एवं वित्‍तीय कार्य संपन्न होंगे ।तीन दिवसीय सत्र के महत्वपूर्ण शासकीय कार्यों में नवनिर्वाचित 28 विधायकों को शपथ दिलायी जाएगी तो मध्य प्रदेश विधान सभा को नौ महीने बाद निर्वाचित विधानसभा अध्यक्ष भी मिलेगा। प्रोटेम स्पीकर रामेश्वर शर्मा विधानसभा अध्यक्ष के बतौर सदन में दिखेंगे या फिर मंत्री के रूप में अपनी नई पारी शुरू करेंगे…यह भी अब वर्ष 2020 में ही तय हो जाएगा।

मध्य प्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर भी लगातार क़यास लगाए जा रहे हैं। सबसे ज़्यादा इंतज़ार भाजपा से विधायक चुनकर आए तुलसी राम सिलावट और गोविन्द सिंह राजपूत को है। संवैधानिक बाध्यता के चलते जिन्हें मंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। विधायक चुने जाने के बाद शपथ ग्रहण करते ही इनका मंत्री पद का दावा सरकार और संगठन कोई भी नकार नहीं पाएगा। और शायद इस एक महीने में सरकार और संगठन के पास भी पर्याप्त समय है कि वह क्षेत्रीय, जातीय और राजनैतिक समीकरणों के मुताबिक़ संतुलन बनाते हुए वह नाम भी तय कर सकती हैं जिन्हें मंत्रिमंडल विस्तार में जगह दी जानी है। ऐसे में नए साल में मंत्री बनने की सौग़ात भी भाजपा विधायकों को मिल सकती है।जिस तरह भारतीय जनता पार्टी में जल्द से जल्द संगठन स्तर पर नई टीम गठित किए जाने की बात जोरों पर चल रही है, उसके मुताबिक़ मंत्रिमंडल विस्तार की उम्मीद भी की जा सकती है।क्योंकि मंत्री बनने वाले मुख्य-मुख्य चेहरे पहले से ही तैयार बैठे हैं, बस सरकार और संगठन की हरी झंडी मिलना बाक़ी है।राजेन्द्र शुक्ल, अजय विश्नोई, गौरीशंकर बिसेन सहित वह तमाम नाम है जो अपनी वरिष्ठता और पार्टी के प्रति अपने समर्पण के साथ ही यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सरकार और संगठन संतुलन बैठाएगा और सम्मान पाने की सूची में उनका भी नाम आएगा।अब जब चौदहवीं विधानसभा के मुक़ाबले इस बार भाजपा विधायकों की संख्या भी कम है और पिछली सरकार के कई मंत्री भी चुनाव हार कर दावेदारी से बाहर है, ऐसे में भाजपा के हाशिये पर रहे वरिष्ठ विधायक भी इंसाफ़ की बाट जोह रहे हैं, जिसे क़तई भी बेजा नहीं माना जा सकता।
यह सत्र इसलिए भी याद किया जा सकता है कि सरकार इसमें धर्म स्वातंत्र्य संशोधन विधेयक लाने की बात भी कह रही है।गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा बार-बार इस बात को दोहरा रहे हैं कि वह लव जो जिहाद की तरफ़ ले जाए … क़तई मंज़ूर नहीं है। विभाग ने इस विधेयक से संबंधित ड्राफ़्ट भी तैयार कर लिया है और बाक़ी खानापूर्ति के बाद इस सत्र में यह विधेयक पारित होकर मूर्त रूप ले सकता है। गृह मंत्री पहले ही यह बात कह चुके हैं कि आगामी सत्र में धर्म स्वातंत्र्य संशोधन विधेयक लाया जाएगा। उत्तर प्रदेश की तर्ज़ पर मध्य प्रदेश में भी धर्मांतरण पर सरकार इस विधेयक के ज़रिए सख़्त रवैया अपनाएगी।

निश्चित तौर से यह सत्र अति महत्वपूर्ण है। कांग्रेस की 15 महीने की सरकार के बाद बनी भाजपा सरकार के नौ माह गुज़रने के बाद यह पहला सत्र है, जब सदन में भाजपा सत्ता में और कांग्रेस विपक्ष में बैठी दिखाई देगी। ऐसे कई चेहरे मंत्री बनकर भाजपा सरकार के खेमे में दिखेंगे जो 15 महीने तक कांग्रेस सरकार में भी सत्ता में रहे थे। विचारधारा बदली हुई होगी… पर चेहरे वही होंगे, जो कभी मुख्यमंत्री कमलनाथ के बचाव में विपक्ष में बैठे भाजपा के विधायकों पर निशाना साधते थे, वही अब मुख्यमंत्री शिवराज के बचाव में विपक्ष में बैठे कांग्रेस विधायकों पर निशाना साधेंगे। तेवरों में कितना फ़र्क पड़ता है यह ग़ौर करने लायक होगा।

corona tum batao toh….tumne chala ya tum chale gaye…article by Kaushal kishore chaturvediji

कोरोना तुम बताओ तो … तुमने छला या तुम छले गए …?

कौशल किशोर चतुर्वेदी

मध्य प्रदेश में एक बार फिर कोरोना के बढ़ते मरीज़ों ने सरकार को चिंता में डाल दिया है।मध्य प्रदेश में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा दो लाख की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहा है तो मौतों का आंकड़ा भी 3 हज़ार के पार पहुँचकर एक बार फिर गति तेज कर डरा रहा है।तीन नवंबर के पहले तक प्रदेश की 28 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव के मद्देनज़र ऐसा लगने लगा था कि अब कोरोना की छुट्टी हो चुकी है। और प्रदेश सरकार द्वारा काढ़ा वितरण का कार्यक्रम प्रदेशवासियों की प्रतिरोधक क्षमता इतनी बढ़ा चुका है कोरोना का पावर बौना हो चुका है।जिस तरह राजनीतिक सभाओं में हज़ारों की भीड़ कोरोना को मुँह चिढ़ा रही थी, लग रहा था कि अब कोरोना शर्म के मारे ख़ुद ही ज़मीन में गड़ जाएगा। तो जहाँ चुनाव नहीं थे वहाँ बाज़ारों की भीड़ ने राजनीतिक सभाओं की भीड़ को भी मात कर दिया था। महीनों से धार्मिक स्थलों से बिछड़े लोग धार्मिक स्थलों पर इस तरह उमड़े थे कि लगने लगा था कि कोरोना इतनी भीड़ देखकर ख़ुद ही डरकर भाग जाएगा। शादियों में लोग झूम झूमकर नाचने लगे थे। ऐसा लगने लगा था कि सरकार, राजनैतिक दल, मतदाता और प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता की खुशियाँ देखकर कोरोना ने ही मातम मनाना शुरू कर दिया था। और कोरोना से भी ज़्यादा रोने की आवाज़ वैक्सीन की आ रही थी की इतनी बड़ी बीमारी होने के बाद भी किसी ने हमारा इंतज़ार भी नहीं किया और खुली सड़क पर सीना तान कर इस तरह निकल पड़े हैं जैसे बिना वैक्सीन के ही कोरोना दफ़न और जनता अपनी मस्ती में मगन। कोरोना ने भी सोच लिया था कि जब लुका छुपी का खेल शुरू ही कर दिया है तो अब देख ही लो कि बाज़ी कौन जीतता है? लोगों का दुस्साहस देखकर कोरोना ने एक क़दम पीछे खींच कर 11 क़दम आगे बढ़ने की रणनीति पर अमल करने की ठानी और अब एक बार फिर नाइट कर्फ्यू लगाने पर सरकार को मजबूर कर दिया है। मध्यप्रदेश में इंदौर, ग्वालियर, विदिशा और रतलाम के बाद कोरोना से बचाव के लिए सरकार ने दतिया जबलपुर और धार में भी नाइट कर्फ्यू लगाने का फ़ैसला किया है। हो सकता है कि कोरोना ने और ज़्यादा रंग दिखाया तो फिर मजबूर जनता को लॉक डाउन जैसे हालातों का सामना फिर से करना पड़े।

पर इस पूरे मामले में यह समझ में नहीं आ रहा है कि छला कौन गया है? जनता छली गई या फिर सरकार छली गई अथवा कोरोना ख़ुद ही छला गया है? यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि जनता ने सरकार और कोरोना को छला या फिर सरकार और राजनैतिक दलों ने मिलकर जनता और कोरोना को छला अथवा कोरोना ही इतना शातिर निकला कि उसने सरकार, राजनैतिक दल और जनता सभी को एक साथ छल लिया? यह बात कोरोना ही साफ़ कर सकता है लेकिन विडंबना यह है कि जब से यह कमबख्त आया है सबकी नाक में दम कर रखा है, फेफड़ों का जीना मुश्किल कर दिया है लेकिन यह है कि कुछ बोलता भी नहीं है। मिस्टर इंडिया बन कर बिना दिखे ही जिसके गले पड़ता है उसे चारों खाने चित्त कर देता है। अमेरिका में ट्रंप के गले पड़ा तो उसकी सरकार ही लील गया। लाखों जानें लील गया तो लाखों लोग इसके साइड अफेक्ट से ही मरने को मजबूर हो गए। पर सवाल वही है कि आख़िर कौन छला गया? कोरोना तुम ही बता दो कि तुम छले गए या फिर तुम्हें छला गया है?

फ़िलहाल जब तक जवाब नहीं मिलता है तब तक चाहे मॉर्निंग वाक हो या ईवनिंग वाक मास्क लगाना अनिवार्य है…।कोई सामान बेचे या खरीदे मास्क अनिवार्य रूप से लगाना होगा…।
कार – मोटरसाइकिल पर घूमने वालों के लिए भी मास्क लगाना होगा..।जो मास्क नहीं लगायेगा उसके खिलाफ कार्यवाई होगी…और मुँह दिखाई काफ़ी महँगी पड़ेगी। देश भक्ति का जज़्बा लिए हुए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें और सैनेटाइजर का भी भरपूर प्रयोग करें।कई शहरों में नाइट कर्फ्यू लग गया है बाक़ी शहर वाले भी तैयार रहें लेकिन रात में 10 बजे तक शराब की दुकाने खुली रहेंगी। इसलिए पैनिक होने की कोई ज़रूरत नहीं है। कोरोना का जवाब जल्दी ही आ जाएगा कि उसे छला गया है या उसने जनता को छलने का देशद्रोह किया है।जवाब आने तक शांति बनाए रखें और क़ानून व्यवस्था का पूरी तरह से पालन करें।

Paryatan cabinet,gau cabinet,krishi cabinet…..cabinet ka kad kam ya vishay vishesh par zayada focus…article by Kaushal kishore chaturvediji

पर्यटन कैबिनेट, गौ कैबिनेट, कृषि कैबिनेट … कैबिनेट का क़द कम या विषय विशेष पर ज्यादा फ़ोकस …?

कौशल किशोर चतुर्वेदी
मध्य प्रदेश सरकार ने ग़ौ धन के संरक्षण एवं संवर्द्धन तथा समग्र रूप से निर्णय लेने एवं योजना बनाने के लिए गौ कैबिनेट का गठन किया है। इसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अलावा पाँच अन्य मंत्री गृह मंत्री, वन मंत्री, कृषि मंत्री, पशुपालन मंत्री, पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री शामिल हैं। गोपाष्टमी के अवसर पर प्रथम गौ- कैबिनेट 22 नवंबर को आगर मालवा के गौ-अभ्यारण में होगी।
वहीं सरकार ने पर्यटन मामलों के लिए पर्यटन कैबिनेट का पुनर्गठन किया है। इसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अलावा छह अन्य मंत्री लोक निर्माण विभाग मंत्री, वन मंत्री, वित्त मंत्री, आदिम जाति व अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री, पंचायत ग्रामीण विकास मंत्री तथा पर्यटन मंत्री को शामिल किया गया है।
इससे पहले सरकार ने कृषि कैबिनेट का भी गठन किया है। कृषि कैबिनेट में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अलावा गृह मंत्री, लोक निर्माण कुटीर एवं ग्रामोद्योग मंत्री, जल-संसाधन मछुआ कल्याण तथा मत्स्य विकास मंत्री, किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री को शामिल किया गया है। इनके अलावा सात अन्य मंत्रियों को कृषि कैबिनेट का सदस्य बनाया गया है। कृषि कैबिनेट का काम किसानों और कृषि से जुड़े मामलों को देखना और उसके लिए नीतियां तैयार करना है।

अलग-अलग सेक्टर पर फ़ोकस करने के लिए सरकार अब इस तरह अलग-अलग कैबिनेट बनाने पर फ़ोकस कर रही है। जिसमें कैबिनेट के सभी मंत्रियों की तुलना में गिने चुने मंत्री ही बैठकर फ़ैसले करेंगे और नीतियों का निर्माण करेंगे। क्या इसे ठीक उसी तरह समझा जा सकता है कि जिस तरह डॉक्टर, इंजीनियर, विज्ञान-तकनीकी, शोध आदि क्षेत्रों में आंतरिक तौर पर भी अलग-अलग सेक्टर में विशेषज्ञता पर फ़ोकस किया जाता है, उसी तरह सरकार भी विषय विशेष से जुड़े मंत्रियों को शामिल कर अलग-अलग कैबिनेट के गठन पर फ़ोकस कर ज़्यादा सार्थक परिणाम पाने की कवायद कर रही है।निश्चित तौर से यह सही दिशा में लिए गए फ़ैसले माने जा सकते हैं।

पर सवाल यह भी है कि कहीं इस कवायद के ज़रिए सरकार ज़्यादा मंत्रियों की बेवजह दी जाने वाली राय से बचने का रास्ता तो नहीं ढूंढ रही है। हो सकता है कि बाक़ी मंत्री भले ही इन विभागों से न जुड़े हों लेकिन नीति निर्माण और योजनाओं को बनाने में उनकी राय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हो। ऐसे में सीमित मंत्रियों की कैबिनेट कहीं बेहतर परिणाम पाने के मामले में भी सीमित दायरे में तो नहीं सिमट रही है? सरकार को एक बार इस विषय पर भी विचार-विमर्श ज़रूर करना चाहिए।

दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि जिस तरह कृषि, पर्यटन और गौ कैबिनेट का गठन किया गया है, क्या इसी तर्ज़ पर आगे महिलाओं के मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करने, योजनाएं बनाने, नीतियां बनाने के लिए महिला कैबिनेट, कुपोषण को दूर करने स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर कार्ययोजना बनाने के लिए स्वास्थ्य कैबिनेट, शिक्षा के क्षेत्र में रोज़गारोन्मुखी क़वायद के लिए एजुकेशन कैबिनेट और क़ानून व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए लॉ एंड ऑर्डर कैबिनेट वग़ैरह वग़ैरह के गठन पर भी सरकार विचार कर सकती है। यदि बेहतर परिणाम पाने के लिए अलग-अलग कैबिनेट कारगर साबित होंगी तो क्या अन्य क्षेत्रों में भी बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए अलग-अलग कैबिनेट के गठन को दरकिनार किया जा सकता है ?

एक छोटा सा सवाल और भी सभी के मन में आ सकता है कि इस समय सारे विभागों और सारे विषयों की सेहत को संभालने के लिए सबसे ज़रूरी है प्रदेश की अर्थव्यवस्था की सेहत पर फ़ोकस करना। ऐसे में सरकार को क्या ‘वित्त कैबिनेट’ के गठन पर भी विचार करना चाहिए। ताकि सीमित संख्या में वरिष्ठ और अनुभवी मंत्री और अर्थशास्त्री मिलकर मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में प्रदेश की आर्थिक नीति को सुदृढ़ करने वाली नीतियों और योजनाओं का निर्माण करने में मददगार साबित हो सकें। फिलहाल जिसकी ज़रूरत प्रदेश को शायद सबसे ज़्यादा है।

मूल सवाल यही है कि अलग-अलग कैबिनेट का गठन कहीं कैबिनेट का क़द कम करने की कवायद तो नहीं है। या फिर अलग-अलग विषय और सेक्टर पर ज़्यादा महत्व और विषय विशेष पर ज्यादा फ़ोकस करने की कवायद है। यदि बात विषय विशेष पर बेहतर परिणामों की है तो निश्चित तौर पर कई क्षेत्र खुद के लिए कैबिनेट विशेष के गठन का इंतज़ार कर रहे हैं। ताकि पर्यटन, गौ और कृषि की तरह ही अन्य ज़रूरी क्षेत्र व विषयों पर भी बेहतर नीतियां बनायी जा सकें और बेहतर योजनाओं का निर्माण भी हो सके। जिससे प्रदेश के सभी वर्गों की सेहत सुधर सके। किसान भी ख़ुश हों, नौजवान भी फीलगुड कर सकें, महिलाओं-शिशुओं की भी सेहत सुधर सके, आदिवासी-अनुसूचित जाति की जनसंख्या में भी ख़ुशहाली का अनुभव हो, क़ानून व्यवस्था बेहतर हो और प्रदेश अपराध मुक्त हो सके, और तो और प्रदेश की माली हालत भी सुधरे एवं प्रदेश मालामाल हो सके।

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satar ki taraf nigahe….intazaar shapath aur mantri mandal vistar ka…article by Kaushal kishore chaturvediji

सत्र की तरफ़ निगाहें … इंतज़ार शपथ और मंत्रिमंडल विस्तार का …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

विधानसभा चुनावों में जीत का परचम फहराने वाले विधायकों की निगाह अब विधानसभा पर टिकी हैं। शीतकालीन सत्र होता है या नहीं? यह बड़ा सवाल है। अगर शीतकालीन सत्र सांकेतिक हुआ तब नवनिर्वाचित 28 विधायकों के शपथ का रास्ता भी साफ़ हो पाता है या नहीं, यह भी बड़ा सवाल है। हालाँकि सरकार अनुपूरक बजट लाने का मन बनाती है तो यह सत्र एक से ज़्यादा दिन का भी प्रस्तावित किया जा सकता है। पर अगर शीतकालीन सत्र टालकर सरकार सीधा बजट सत्र पर फ़ोकस करती है तब शपथ का क्या होगा, यह नवनिर्वाचित विधायकों की जिज्ञासा भी है और उन विधायकों के मन में बड़ा सवाल भी है जो चुनाव से ऐन वक़्त पहले तक मंत्री थे लेकिन संवैधानिक प्रावधानों के चलते इस्तीफ़ा देकर उन्होंने नियम का पालन किया था। मंत्री पद से इस्तीफ़ा देने वाले दो दिग्गज नेता कहीं न कहीं जल्दी ही फिर से अपने विभाग संभालने की उम्मीद में है। अगर उनके नाम पहले पाँच मंत्रियों में शुमार न होते तो शायद वह भी विधायक बनने के साथ-साथ मंत्री पद भी सुशोभित करते रहते। और फिर उन्हें मंत्रिमंडल विस्तार की चिंता नहीं करनी पड़ती। पर अब वह कब दोबारा कुर्सी पर बैठते हैं, यह तय करना भाजपा सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान पर सीधे-सीधे निर्भर करता है तो भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को ही पर्दे के पीछे से पूरी कवायद करनी है कि शिवराज मंत्रिमंडल का स्वरूप अब आगामी लंबी पारी के लिए कैसा होगा ? जिसे तय करने में थोड़ा वक़्त भी लग सकता है। ऐसे में शपथ और मंत्रिमंडल विस्तार का इन्तज़ार बेसब्री पैदा कर सकता है।
गृह एवं संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा के बड़े बयान ने नवनिर्वाचित विधायकों की जल्दी ही सत्र बुलाए जाने की उम्मीद ज़रूर बढ़ाई है । डॉ. मिश्रा ने कहा है कि अगले विधानसभा सत्र में लव जिहाद को लेकर विधेयक लाया जा रहा है।लव जिहाद में 5 साल के कठोर कारावास की सजा का प्रावधान रहेगा।गैर जमानती धाराओं में केस दर्ज होगा।सहयोग करने वाला भी मुख्य आरोपी की तरह अपराधी होगा। शादी के लिए स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने के लिए एक महीने पहले कलेक्टर के यहां आवेदन करना अनिवार्य रहेगा। जिस तरह इस विधेयक की चर्चा हुई है उसके मुताबिक़ उम्मीद लगायी जा सकती है कि सरकार दिसंबर में शीतकालीन सत्र बुलाकर विधेयक पेश कर सकती है तो अनुपूरक बजट और विधायकों की शपथ जैसे शासकीय कार्य भी संपन्न किए जा सकते हैं। वहीं मंत्रिमंडल विस्तार में समय भी लगे, तब भी सरकार इस्तीफ़ा देने वाले दो पूर्व मंत्रियों को पूर्ववत स्थिति में लाने का फ़ैसला ले सकती है।
हालाँकि अगर सरकार ने शपथ दिलाने का और सत्र बुलाने का फ़ैसला लिया तो प्रोटेम स्पीकर द्वारा नवनिर्वाचित विधायकों को शपथ दिलाने के बाद स्पीकर का चुनाव भी अपेक्षित होगा। ऐसे में यह भी तय करना होगा कि अगला स्पीकर कौन बनेगा ? तो प्रोटेम स्पीकर रामेश्वर शर्मा की भूमिका आगे क्या होगी ? वह मंत्रिमंडल का चेहरा बनेंगे या फिर स्पीकर के तौर पर पारी शुरू करेंगे। ऐसे में शीतकालीन सत्र बुलाए जाने पर सरकार को कुछ फ़ैसले तो जल्दी लेने की बाध्यता में बँधना ही पड़ सकता है।हालाँकि सरकार किसी तरह की बाध्यता से परहेज़ ही करेगी यह बात भी तय है। भाजपा के 19 विधायक चुने जाने के बाद वैसे भी सरकार अब समझौतों के दायरे से बाहर हो चुकी है।
फिर भी मंत्रिमंडल विस्तार सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। ग्वालियर-चंबल में विधानसभा चुनाव लड़ने वाले जिन पूर्व विधायकों को मंत्री बनाया गया था, अब वे मंत्री बने रहेंगे…फ़िलहाल यह दावा कोई नहीं कर सकता। क्योंकि अब सरकार को मंत्रिमंडल विस्तार में क्षेत्रीय संतुलन, जातीय संतुलन और अन्य राजनीतिक समीकरणों को भी साधना होगा।ऐसे में शिवराज सरकार के मंत्रिमंडल का स्वरूप वर्तमान से भिन्न होना तय है। ख़ास तौर से विंध्य, महाकौशल, मालवा के महत्वपूर्ण नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल कर असंतोष को ख़त्म करना सरकार की प्राथमिकता रहेगी। सरकार को यह भी तय करना पड़ेगा कि मंत्रिमंडल विस्तार पंचायत चुनाव के पहले किया जाए या बाद में। शीतकालीन सत्र पंचायत चुनाव के बीच बुलाया जाए या फिर टालने पर सहमति बनायी जाए और प्रोटेम स्पीकर से ही काम चलाकर सत्र के अति महत्वपूर्ण शासकीय कार्यों को संपन्न करवाया जाए। इस बीच के रास्ते में हो सकता है सरकार मंत्रिमंडल विस्तार और शपथ जैसे कार्यों को फिलहाल टाल दे और नवनिर्वाचित विधायकों की उम्मीदों का सूरज नए साल में ही प्रतीक्षा के बादलों पर विराम लगाते हुए उजाला करे। तब तक पूर्ण सत्र पर निगाहें टिकी ही रहें और मंत्री बनने और शपथ ग्रहण की रस्म का इंतज़ार भी चैन से न जीने दे।

Read moresatar ki taraf nigahe….intazaar shapath aur mantri mandal vistar ka…article by Kaushal kishore chaturvediji

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