Kisan,gareeb, majdoor aur majboor ko bhi oxygen chahiye

किसान, गरीब, मज़दूर और मजबूर को भी चाहिए ऑक्सीजन …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कोरोना संकट ने पहली बार यह साबित कर दिया है कि भविष्य में ऑक्सीजन को लेकर भी राज्यों में संघर्ष की नौबत आ सकती है। और हो सकता है कि जिस तरह नदियों के पानी के बँटवारे के मामलों में जिस तरह कई राज्यों की दुश्मनी जगज़ाहिर है, ठीक उसी तरह ऑक्सीजन के आदान-प्रदान को लेकर भी राज्य बाँहें ऊपर किए एक-दूसरे के सामने खड़े नज़र आएँगे। यह बात तो हुई मरीज़ों के लिए ऑक्सीजन की तंगी की, जिसके बिना मरीज तड़प – तड़प कर दम तोड़ने को मजबूर होता है। यानि कि ऑक्सीजन के बिना घुटन भरी मौत मरीज का दुर्भाग्य बन जाती है। पर उस घुटन का क्या जो अस्पतालों में ऑक्सीजन की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद घर-घर में किसान, मज़दूर, गरीब और मजबूरों का दम घोंट रही है। यह ऑक्सीजन की कमी वैसे तो हर काल, परिस्थिति और समय में रही है। आजादी के पहले यानि ग़ुलामी के दौर में भी रही है और आजादी के बाद यानि लोकतंत्र व संविधान की दुहाई के समय भी बनी हुई है।ऑक्सीजन की यह कमी कब पूरी होगी, जब गरीब, किसान, मज़दूर के रोटी, कपड़ा और मकान की लड़ाई उसके तन-मन को हर पल तार-तार करने से बाज आएगी। सरकारें मरीज़ों के लिए कृत्रिम ऑक्सीजन की व्यवस्था कर अपनी उपलब्धि का बखान तो कर लेंगी लेकिन गरीब, किसान और मज़दूर मजबूर के मुरझाए, सूखे और झुर्रियों से भरे चेहरों पर ख़ुशहाली लाने वाली ऑक्सीजन की पूर्ति कब होगी … क्या सरकारों के पास इसका जवाब है? शायद नहीं …. पर विडंबना तो यह है कि काग़ज़ों में तो ऐसे सभी चेहरों के आगे कॉलम में ख़ुशहाली सदियों से दर्ज है। और यही सिलसिला अब तक बदस्तूर जारी है।

लोकतंत्र का पर्व जब-जब आता है तो यही किसान, गरीब, मज़दूर और मजबूर इंसान राजनीतिक सभाओं की भीड़ का हिस्सा बनकर अपनी ख़ुशहाली दर्ज कराता है…यह या तो भाग्यविधाताओं को सामने देखने की खुशी होती है या फिर दुखों से भरी घुटन से निजात पाने की छटपटाहट।
फिर लोकतंत्र का महादान मतदान करने से पहले राजनीतिक रंगों से सराबोर गरीब किसान मज़दूर मजबूर मतदाता एक बार फिर ख़ुमारी में कुछ समय अपने चेहरे पर मुस्कान लाने की क़वायद करता है। पर ऑक्सीजन की कमी की गवाही काला पढ़ता उसका चेहरा, गालों की जगह चेहरे के बाहर झांकती उसकी हड्डियाँ और बमुश्किल चालीस साल की उम्र में अस्सी की तरह जर्जर दिखता उसका तन चीख़-चीख़ कर दे ही देता है। पर लोकतंत्र की मर्यादा को अपने कंधे पर उठाए अनपढ़ यह मतदाता एडवांस टेक्नोलॉजी की ईवीएम मशीन तक पहुँचकर अपने मत को ठिकाने तक पहुँचा ही देता है। और एक बार फिर माथे पर हाथ टिकाकर आस लगाता है कि शायद अबकी बार ऑक्सीजन की कमी दूर होगी। शरीर का हर अंग पर्याप्त ऑक्सीजन पाकर स्वस्थ अनुभव करेगा। और उसके चेहरे पर भी वह चमक देखने को मिलेगी जो भाग्यविधाताओं के चेहरे और उनकी टॉप मॉडल की महँगी गाड़ियों पर देखने को मिलती है…।पर आजादी के 73 साल बाद तक नाउम्मीदी ही उसके खाते में आई है।और भाग्यविधाता एक-दूसरे पर आरोपों की झड़ी लगाकर इस गरीब किसान मज़दूर और मजबूर को गुदगुदी कर यह दुस्साहस भी करने से बाज नहीं आते कि वह बंदरबाँट का आनंद लेता रहे और मुँह का निवाला छीनते भाग्यविधाताओं पर नज़र गढ़ाए रहे। यह भी अमिट तथ्य मान ले कि भाग्यविधाता भाग्य लेकर ही पैदा हुआ है और किसान, मज़दूर, गरीब और मज़दूर के हिस्से दुर्भाग्य आया था जिस दिन क़िस्मत का बँटवारा हो रहा था। इसी धारणा के साथ वह अपने पिता, दादा, परदादा और पूर्वजों का चेहरा भी गर्व के साथ लेता रहे कि उन्होंने ही दुर्भाग्य की विरासत को उनकी झोली में डाला है जिसे सँजोए रखना ही उसका परम कर्तव्य है …चाहे युग बदलते रहें, चाहे राजतंत्र हो या लोकतंत्र पर उसके हिस्से में ऑक्सीजन की कमी से घुट-घुटकर जीने का अमिट लेख अजर और अमर है।
सरकारें इन उपलब्धियों पर गर्व करती रहेंगीं कि गरीबों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ग़रीबी रेखा के नीचे बढ़ रहे गरीबों को राशनकार्ड जारी करने और उन्हें एक रुपए किलो गेहूं , दो रुपए किलो चावल दिलाने का हिसाब गिनाने की वाहवाही सरकारें लूटती रहेंगीं। गरीब सड़क बनाएँगे जिन पर भाग्यविधाताओं की महँगी गाड़ियाँ बिना ब्रेक लगाए सरपट दौड़ती रहेंगी। और इन्हीं गरीब मज़दूर किसान और मजबूरों से सुरक्षित रहने के लिए उनकी सुरक्षा का दायरा भी लगातार बढ़ता रहेगा। गरीब ग़रीबी पर गर्व करते रहें और भाग्यविधाता अपने भाग्य पर गर्व करते रहेंगे। ऑक्सीजन का संघर्ष हमेशा सांसें लेता रहेगा।यह सवाल हमेशा विपक्ष के ज़ेहन में रहेगा कि गरीब, मज़दूर, किसान और मजबूरों को ऑक्सीजन की जरूरत है।

Gavo ka vikas, rach raha itihaas….

गाँवों का विकास, रच रहा इतिहास*

कौशल किशोर चतुर्वेदी

ग्रामीण विकास मंत्रालय की महत्वपूर्ण योजनाएं एवं इस वर्ष की उपलब्धियाँ गाँवों के विकास के मामले में इतिहास रच रही हैं।ग्रामीण विकास मंत्रालय इस वर्ष ग्रामीण भारत के विकास एवं ग्रामीणों के कल्याण पर लगभग 2 लाख करोड़ रुपए की धनराशि व्यय करेगा। इसमें से अब तक 1 लाख 5 हजार करोड़ रुपए की राशि राज्यों को जारी कर चुका है। ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का संकल्प है कि हर गरीब हाथ को रोज़गार मिले, किसानों की आय दोगुनी हो, हर पात्र हितग्राही को आवास मिले और प्रधानमंत्री की मंशा के मुताबिक़ गाँव आत्मनिर्भर बन सकें। विभागीय उपलब्धियाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इच्छा के अनुरूप केंद्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के प्रयासों के फलीभूत होने की गवाही दे रही हैं।

*25.75 करोड़ श्रम दिवस का रोजगार सृजन-*
विभाग ने गरीब कल्याण रोजगार अभियान के तहत
25 करोड़ 75 लाख 68 हज़ार 175 श्रम दिवस का रोजगार सृजन कर कुल 21549.32 करोड़ राशि का व्यय किया है। यह कार्यक्रम 20 जून 2020 से देश के 6 राज्यों के 116 जिलों में संचालित किया जा रहा है।

मनरेगा में बजट भरपूर, मज़दूरी बढ़ायी –
मनरेगा के तहत वर्तमान वित्तीय वर्ष में 192.97 करोड़ श्रमदिवस के रोजगार का सृजन कर 9.93 करोड़ लोगों को जॉब ऑफर दिया गया। राज्यों को 58,960.52 करोड़ राशि जारी की गई है। 1 अप्रैल 2020 से मनरेगा की मजदूरी दर औसतन 182 रु. से बढ़ाकर 202 रुपए कर दी गई है। मनरेगा के तहत वर्ष 2020-21 के लिए 40,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त प्रावधान किया गया है। मनरेगा आवंटन 61650 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 101500 करोड़ रुपए कर दिया गया है।

26 हज़ार किमी सड़कें स्वीकृत-
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना फेज़ -3 के तहत 82500 करोड़ रुपए की लागत से 125000 किलोमीटर सड़क निर्मित करने का लक्ष्य है। इस योजना के तहत देश में अब तक 26000 किलोमीटर सड़क निर्माण के कार्य स्वीकृत किये जा चुके हैं।

एक करोड़ से ज्यादा आवास पूर्ण –
प्रधानमंत्री आवास योजना ( ग्रामीण) के अंतर्गत कुल 2.95 करोड़ आवास निर्मित करने का लक्ष्य है। अब तक 2.21 करोड़ आवास राज्यों को आवंटित किये जा चुके हैं एवं लगभग 1 करोड़ से ज्यादा आवास पूर्ण किये जा चुके हैं। इस बाबत राज्यों के पास अब तक कुल 160555.29 करोड़ रुपए की धनराशि योजना के क्रियान्वयन के लिए उपलब्ध है। वर्ष 2022 तक सभी पात्र आवासहीनों को आवास उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।

महिलाओं की चिंता –
कुल 20.65 करोड़ खाता धारकों को तीन माह के लिए 500 रुपए प्रतिमाह की अनुग्रह राशि खाते में अंतरित की गई। इस पर कुल 31000 करोड़ रुपए की धनराशि व्यय की गई।

वरिष्ठ नागरिकों, विधवाओं एवं दिव्यांगों के लिए सहायता-
2.82 करोड़ बुजुर्गों, विधवाओं एवं दिव्यांग श्रेणी के लोगों को 500 रु. की दो किश्तों में कुल 1000 रुपए की सहायता जारी की गई। इस पर कुल व्यय 2815 करोड़ रुपए किए गए।

उपलब्धियों का पर्याय बना पंचायती राज मंत्रालय-

पंचायती राज मंत्रालय की प्रमुख योजनाएँ के ज़रिए पंचायतों का कायाकल्प किया जा रहा है। गांवों में ब्रॉडबैंड,डिजिटाइजेशन, डिजिटल भुगतान न जैसे क्रांतिकारी क़दम इतिहास बना रहे हैं। पंचायती राज मंत्रालय की उपलब्धियां आधुनिक भारत के गाँवों की उजली तस्वीर पेश कर रही हैं।

– देश में स्थानीय शासन की व्यवस्था को सशक्त करने, गांव तक सुराज पहुंचाने और शासन व्यवस्था की शक्ति का विकेंद्रीकरण करने के उद्देश्य से पंचायती राज प्रणाली लागू की गई है। पंचायतों को अनिवार्य संवैधानिक दर्जा प्रदान करते हुए 1993 में 73 वें संविधान संशोधन के भाग IX में जोड़ा गया है। संविधान के अनुसार प्रति पांच वर्ष में चुनाव के माध्यम से पंचायतों के त्रि-स्तरीय पंचायती राज संस्थाओं (ग्राम, ब्लाक एवं जिला) का गठन किया जाता है। भारत में 2,69,347 ग्राम पंचायतें, 6717 ब्‍लॉक पंचायत तथा 654 जिला पंचायतें हैं ।
– पंचायतों के सभी तीन स्तरों पर सीटों का प्रत्यक्ष चुनाव और ब्लॉक और जिला पंचायतों के अध्यक्षों के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव का प्रावधान है। अनुसूचित जाति- अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी संबंधित आबादी के अनुपात में सीटों के आरक्षण का प्रावधान है तो वहीं महिलाओं के लिए अध्यक्ष पदों पर कम से कम एक तिहाई सीटों पर आरक्षण की व्यवस्था की गई है। संविधान के अनुच्छेद 243-घ में पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण बढ़ाने के लिए, आरक्षित वर्गों के लिए सीटों के चक्रण का प्रावधान भी किया गया है।
– पंद्रहवें वित्त आयोग ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2020-21 के लिए, पंचायती राज के सभी स्तरों में ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए 60,750 करोड़ रूपए के अनुदान की सिफारिश की है, जिसमें 50 प्रतिशत (अबद्ध) और 50 प्रतिशत बद्ध (टाइड) हैं। इस बार 15वें वित्‍त आयोग ने पांचवीं और छठी अनुसूची क्षेत्रों की पारंपरिक निकायों को भी ग्रांट उपलब्‍ध कराये जाने की संस्‍तुति की है। अबद्ध बेसिक ग्रांट वेतन या अन्य स्थापना व्यय को छोड़कर, स्थान-विशिष्ट महसूस की गई जरूरतों के लिए ग्रामीण स्थानीय निकायों द्वारा उपयोग किया जा सकता है। बद्ध अनुदान का उपयोग खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) की स्थिति में स्वच्छता एवं रखरखाव, पीने के पानी की आपूर्ति, वर्षा जल संचयन और जल पुनर्चक्रण की बुनियादी सेवाओं के लिए ही किया जाना है।
– पंद्रहवें वित्त आयेाग की अंतरिम रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई है कि केंद्र द्वारा जारी अनुदान को वर्तमान राज्य वित्त आयोग की स्वीकृत सिफारिशों के आधार पर ग्राम पंचायतों के लिए 70-85 प्रतिशत, मध्यवर्ती पंचायतों के लिए 10-25 प्रतिशत एवं जिला पंचायतों के लिए 5-15 उपयोग किया जाएगा, ताकि ज्यादा से ज्यादा धनराशी गांवों के विकास कार्यों में उपयोग हो सके।
– अबद्ध एवं बद्ध अनुदान की पहली किस्त के रूप में 30375 करोड़ रूपए 17 जून 2020 और 15 जुलाई, 2020 को सभी 28 राज्यों में ग्रामीण स्थानीय निकायों को जारी कर दिए गए है।
– मिशन अंत्‍योदय की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 76 प्रतिशत ग्राम पंचायतों में आंतरिक सड़कों का निर्माण पूरा किया जा चुका है और स्‍ट्रीट लाईट आदि भी उपलब्‍ध कराई गई हैं ।
– अभी तक लगभग 1.40 लाख ग्राम पंचायत ब्राडबैंड कनेक्टिविटी से जुड़ चुके हैं । 60 हजार ग्राम पंचायतों में पंचायत भवनों में ही कॉमन सर्विस सेंटर की स्‍थापना की जा चुकी है। आप अवगत हैं कि विगत पांच वर्षों में विशेष रूप से ग्राम पंचायतों के कार्यों का डिजीटाइजेशन किया गया है । माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा ई-ग्राम स्‍वराज पोर्टल तथा एप्‍प का शुभारंभ दिनांक 24 अप्रैल, 2020 को किया गया ।
– अभी तक लगभग दो लाख 18 हजार ग्राम पंचायत प्रिया साफ्ट तथा 24 राज्यों में 1.57 लाख ग्राम पंचायत पीएफएमएस पेंमेंट पोर्टल पर पंजीकृत हो चुके हैं और 1.05 लाख पंचायतों ने लगभग 21,000 करोड़ रूपए का डिजीटल भुगतान किया है।
– राष्‍ट्रीय ग्राम स्‍वराज अभियान के अंतगत पूरे देश में अभी तक लगभग 72 लाख पंचायत प्रतिनिधियों, पंचायत पदाधिकारियों और ग्राम सभा सदस्‍यों ने प्रशिक्षण प्राप्‍त किया है।
– गाम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी)- लगभग 90 प्रतिशत ग्राम पंचायतों की वर्ष 2020-21 की ग्राम पंचायत विकास योजना ई-ग्राम स्‍वराज पोर्टल पर अपलोड करने की कार्यवाही पूर्ण की जा चुकी है।
– राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार पांच श्रेणियों में दिए जाते हैं, इसमें दीन दयाल उपाध्याय पंचायत सशक्तिकरण पुरस्कार (डीडीयूपीएसपी), नाना जी देशमुख राष्ट्रीय गौरव ग्राम सभा पुरस्कार (एनडीआरजीजीएसपी), बाल हितैषी ग्राम पंचायत पुरस्कार (सीएफजीपीए), ग्राम पंचायत विकास योजना पुरस्कार (जीपीडीपीए) और ई-पंचायत पुरस्कार को शामिल किया गया है।
– राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार 2020 (मूल्यांकन वर्ष 2018-19) की विभिन्न श्रेणियों मे देश भर की लगभग 55,000 पंचायतों ने भाग लिया जो पिछले वर्षों की तुलना में लगभग 1.5 गुना से अधिक भागीदारी है। इस वर्ष दीन दयाल उपाध्याय पंचायत सशक्तिकरण पुरस्कार 28 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में 213 पंचायतों (जिला, ब्लॉक,ग्राम) को दिया गया। नानाजी देशमुख राष्ट्रीय गौरव ग्राम सभा पुरस्कार 27 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में 27 ग्राम पंचायतों-ग्राम परिषदों को दिया गया। बाल हितैषी ग्राम पंचायत पुरस्कार 30 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में 30 ग्राम पंचायतों-ग्राम परिषदों को दिया गया। ग्राम पंचायत विकास योजना पुरस्कार 28 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में 28 ग्राम पंचायतों-ग्राम परिषदों को दिया गया। ई-पंचायत पुरस्कार 8 राज्यों को दिया गया।
– स्‍वामित्‍व योजना – माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा विगत 24 अप्रैल, 2020 को राष्‍ट्रीय पंचायती राज दिवस के अवसर पर प्रारंभ किए गए ऐतिहासिक स्‍वामित्‍व योजना के माध्‍यम से भी न केवल ग्राम पंचायतों के आबादी क्षेत्र के अंतर्गत व्‍यक्तिगत सम्‍पत्तियों का सीमांकन अद्यतन ड्रोन टैक्‍नालॉजी का उपयोग करते हुए अगले चार वर्ष में संभव हो सकेगा, वरन् यह ग्राम पंचायत द्वारा प्रभावी सम्‍पत्ति कर लागू करने की भी आधारशिला रखेगा । इस वित्‍तीय वर्ष में उत्‍तर प्रदेश, उत्‍तराखंड, मध्‍य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्‍ट्र तथा कर्नाटक के एक लाख से ज्‍यादा ग्राम पंचायतों के ड्रोन सर्वे का कार्य पूरा किया जाएगा तथा सम्‍पत्ति परिपत्र भू-स्‍वामियों को सौंपा जाएगा।

Sarkaro ki uplabdhiyo ke beech dum todta kisaan…..

सरकारों की उपलब्धियों के बीच दम तोड़ता किसान… नियति की विडंबना…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार में 2004 से 2016 के बीच 13 साल में 15,129 किसानों और खेतिहर मज़दूरों ने आत्महत्या की थी। मध्य प्रदेश विधानसभा में भाजपा सरकार ने ही यह जानकारी दी थी।

आंकडों के अनुसार, वर्ष 2004 में 1638 किसानों और खेतिहर मज़दूरों ने ख़ुदकुशी की, जबकि वर्ष 2005 में 1248, वर्ष 2006 में 1375, वर्ष 2007 में 1263, वर्ष 2008 में 1379, वर्ष 2009 में 1395 और वर्ष 2010 में 1237 ,वर्ष 2011 में 1326, वर्ष 2012 में 1172, वर्ष 2013 में 1090, वर्ष 2014 में 826, वर्ष 2015 में 581 और वर्ष 2016 में 599 किसानों और खेतिहर मज़दूरों ने आत्महत्या की।

राज्य अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आकड़ों के मुताबिक, 2010 से 2015 तक 6 सालों में मध्य प्रदेश में 6594 किसानों ने आत्महत्या की। इससे भी ज्यादा चौंका देने वाला तथ्य यह था कि इन 6,594 किसानों में से 80 प्रतिशत (5300 के आसपास) किसानों ने इसलिए आत्महत्या की क्योंकि वह साहूकारों से लिया लोन का भुगतान करने में असमर्थ थे।
राज्य अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आकड़ों के मुताबिक, साल 2010 और 2015 के बीच, औसतन, रोज़ाना करीबन 3 किसानों ने आत्महत्या की। सीमांत किसान, जिनके पास बहुत ही छोटी ज़मीन है, वह आत्महत्या को ज़्यादा मजबूर हुए। दिलचस्प बात यह है कि साल 2015 में राज्य में सूखे से ज्यादा प्रभावित होने के बाद भी आत्महत्या की घटनाएं करीबन आधी रहीं।

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद 11 दिसंबर से 21 फ़रवरी 2019 तक सात किसानों ने आत्महत्या की थी। यह जानकारी भी विधानसभा में दी गई थी।

किसानों की आत्महत्या के ये आंकड़े सिर्फ़ एक बानगी हैं।इनसे यह भी साबित होता है कि किसानों की आत्महत्या का सिलसिला कभी भी रुका नहीं है। सरकार चाहे भाजपा की रही हो या फिर कांग्रेस की, आंकड़ों के आधार पर सिर्फ़ यही वाहवाही लूटी जा सकती है कि किसके समय में किसानों की आत्महत्याओं की दर कम या ज़्यादा रही है।पर किसानों की क़िस्मत में आत्महत्या नियति बनकर उन्हें मौत को गले लगाने मजबूर करती रही है। यह सिलसिला लगातार जारी है।
मध्य प्रदेश में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं ज्यादा शर्मसार करने वाली हैं क्योंकि पिछले कई सालों से कृषि कर्मण अवार्ड का तमग़ा हासिल कर सरकारें वाहवाही लूटने में आगे रही हैं।अब प्रदेश ने गेहूं उत्पादन और गेहूं ख़रीदी में भी सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।कांग्रेस का दावा है कि किसान कल्याण के बेहतर काम उसके समय 15 माह में हुए हैं तो भाजपा सरकार कृषि क्षेत्र में पिछले पंद्रह साल की सरकार के बाद अब नई पारी के 5 माह में उपलब्धियों का ताज अपने सिर पर बाँधने में कोताही नहीं कर रही। पर किसान है कि अकाल मौत के साथ चोली-दामन का साथ निभाने को अभिशप्त है। सरकारों की उपलब्धियों के बीच किसान दम तोड़ रहा है। नियति की यही विडंबना है।सीहोर , निवाड़ी , विदिशा के बाद अब छिन्दवाड़ा में भी एक किसान की आत्महत्या शायद यही दर्द बयां कर रही है। सरकार ने किसानों को एक बार फिर आय दोगुनी करने और आत्मनिर्भर बनाने का लॉलीपॉप दिया है…हो सकता है कि इसी उम्मीद में किसान आत्महत्या से तौबा कर सरकारों की उपलब्धियों पर मुहर लगा दें।

Chirayu ki atma ka chitrakar by Kaushal kishore Chaturvedi

चिरायु की आत्मा का चीत्कार …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

इस आलेख के ज़रिए हम किसी की व्यक्तिगत भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना चाहते लेकिन हमारा मानना है कि इमारतों का भी अपना ज़मीर होता है। ऐसे में शुरु से विवादों में उलझी चिरायु अस्पताल की वेदना को शब्द देने की हमने एक कोशिश की है।मानो चिरायु अस्पताल खुद अपना दर्द बयां कर रहा है कि जब-जब मध्यप्रदेश में झमाझम बारिश होती है और मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की बड़ी झील का पेट भरने के बाद वह डकार लेती है, तब-तब अगर किसी के पेट में ज़िंदगी को मौत के सामने खड़ा कर देने वाला बेतहाशा दर्द होता है तो वह हूँ मैं यानि चिरायु…। नाम के विपरीत ऐसा लगता है कि अब मेरी बहुत ही अल्प आयु बची है। पर अंत में नाम विजयी होता है और चिरायु यानि मेरे चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान बिखरकर वार्डों में भर्ती अर्थ और व्यर्थ की मार झेल रहे मरीज़ों को दिलासा देने की मायूस करने वाली एक कोशिश ज़रूर करता हूँ। सफल या असफल कोशिश … यह बात अब मुझे बेमानी लगने लगी है।
पर एक सुखद बारिश के असंख्य दुख झेलने के बाद मैं फिर साल भर अगली बारिश तक मौन साध यही अभिशाप देता हूँ कि इंद्र तुम अपनी औक़ात में रहना ताकि अगली साल फिर हमारे दुश्मन बड़ी झील के पानी को हमारे आँगन में देखकर बेवजह विलाप कर हमारी उम्र को नज़र न लगा सकें। वैसे तो हमारा कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता लेकिन (वि)पक्षी चीं-चीं कर हमारा कान फोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते। कभी-कभी तो हमारी आत्मा ही चीत्कार करने लगती है कि किस घड़ी में हमारा जन्म हुआ था कि जब देखो तब हमारा वैभव पानी के स्पर्श करते ही पानी-पानी होने लगता है।लगता तो यह है कि चुल्लू भर पानी में डूबकर ख़ुदकुशी कर लूँ लेकिन पानी ही बार-बार दिलासा देता है कि चिंता मत करो, धैर्य रखो…हमारे जाते ही तुम्हारे शत्रुओं के अरमान बड़ी झील के पानी में स्वाहा हो जाएँगे। बस पानी की यही अदा हमारे मन को सदा से भा रही है। और हम चिरायु हैं और हमारे विरोधियों की चिल्लपौं अल्पायु…अब मुझे भी कुछ-कुछ यह समझ में आने लगा है।

पर मानो यह साल हम पर दोहरी मार करने से बाज़ नहीं आया। कोरोना की मार और बड़ी झील के पानी की मार, इस दोहरी मार और हमलावरों के अंतहीन हमलों से हमारी साँस थम सी रही है, गला रुँध रहा है और मानो मैं वेंटिलेटर पर दिन गिन रहा हूँ।हमें कोविड-19 अस्पताल घोषित किया गया है तो अब लोग चाह रहे हैं कि इसकी पूरी जांच हो।भाई का बात की जाँच…भाजपा हो या कांग्रेस मुख्यमंत्री, मंत्री, पूर्व मंत्री, विधायक, संगठन, सत्ता, विपक्ष-पक्ष हम बिना भेदभाव के दिन-रात सेवा कर रहे लेकिन लोग हैं कि उँगली उठाने से बाज नहीं आते।कभी-कभी तो लगता है कि हमारी कुंडली में अपयश स्थायी शत्रु के स्थान पर कुंडली मारकर बैठा है।मानो यही अपयश ही काल बनकर हमारी अकाल मौत बनने को आतुर है। हमें भूषण के मुकदमा से ज़रूर हिम्मत बंधी है कि एक न एक दिन ज़रूर एक रुपया में हमारे भी सारे गुनाह इसी बड़ी झील के पानी में धुल जाएँगे। एक बात और कि नदी का पानी बाढ़ में जिन-जिन घरों में घुसता है, कोई भी यह बता दे कि क्या वे सब नदी की जगह पर बने हैं? हमारे अस्पताल में पानी की बात का बतंगड़ तो लोग ऐसा बनाते हैं कि लगता है कि या तो मैं भरभराकर पानी में समा जाऊँ या फिर सारी आवाज़ों को बड़ी झील के हवाले कर दूँ …।

लोग कह रहे हैं कि अस्पताल की जाँच हो।
कोरोना इलाज की खुली जाँच हो।डेथ सेंटर बनने का आरोप लगा दिया।अरे जाँच करवा करवा के तो हम थक गए…कभी वन विभाग की जाँच, कभी राजस्व विभाग की जाँच, कभी ग्रीन ट्रिब्यूनल, कभी हाईकोर्ट, कभी ये कोर्ट, कभी वो कोर्ट … पर अब इतना झाग निकलने के बाद भी दाग बरक़रार है। अब ज़मीन की जाँच और इलाज की जाँच की आवाज एक साथ … हद हो गई। जैसे न्याय कलियुग में बचा ही न हो। करा लो भैया, जो जाँच बने सो करा लो। आरोप लगाने वाले चेहरे बदल रहे, हम तो अपनी जगह चट्टान की तरह खड़े। इलाज की बात है सो हर अस्पताल डेथ सेंटर बना दो या लाइफ़ सेंटर।ऐसा तो कोई अस्पताल नहीं होगा जहाँ गंभीर बीमारियों का इलाज होता हो और मरीज मरे न…।हमारी आत्मा का क्लेश हम ही समझ सकते, बाक़ी तो सब दर्शक हैं…दुखांत हो या सुखांत सब फ़िल्म देखकर चैन की नींद से जाएँगे। पर अब हमारी आत्मा तो चीख़ चीख़ के कह रही है कि हो जाए जो होना हो…हम तो रण में खड़े हैं, रणछोड़ नहीं हैं। या तो सुख से जीने दो या फिर जो बने सो एक बार में कर लो …।आख़िर नाम तो अंत में हमारा ही बदनाम हो रहा है कि जैसे चिरायु अस्पताल गुनहगार और बाक़ी सब इज़्ज़तदार। हम तो हर समय मानसिक त्रास झेल झेलकर मौत को न निगल पा रहे न उगल पा रहे।नाम हमारा बदनाम हो रहा और पूरी दुनिया हमारे मज़े ले रही है।और हम अपने मन की बात किससे कहें और सुनने वाला भी कौन है…। अंत में बस यही है कि हमें तो अपनों ने मारा ग़ैरों में कहाँ दम था…हमें वहीं बना दिया जहाँ झील का पानी बारिश में भी बहुत कम था…।

Ye rishta kya kehlata hai….?article by Kaushal kishore Chaturvedi

ये रिश्ता क्या कहलाता है …?

कौशल किशोर चतुर्वेदी

राजधानी में एक जाने माने बिल्डर के यहाँ पड़े आयकर छापे के बाद राजनीतिक गलियारों से होते हुए यह शब्द कानों में गूंज रहे हैं कि ये रिश्ता क्या कहलाता है…?
दरअसल यह कोई पहली दफ़ा नहीं है जब आयकर छापे के बाद इस तरह के ख़ुलासे हुए हों कि आरोपी के राजनेताओं से और नौकरशाहों से क़रीबी रिश्ते हैं। आयकर का हर छापा पर्दे के पीछे क़रीब रहने वाले ऐसे चेहरों को समय समय पर बेनक़ाब करने की कोशिश करता रहता है। पर ये कहानियां समय निकलते ही अतीत के अंधेरों में खो जाती हैं…।और ऐसे ही दूसरे रिश्तों का मायाजाल इसी दौरान जवान होने लगता है…। ख़ास बात यह है कि जिन पर छापा पड़ता है उनके लिए अब यह आम बात हो गई है। क्या कांग्रेस, क्या भाजपा, क्या नौकरशाह, क्या अखिल भारतीय सेवा के अफ़सर, क्या राज्य सेवाओं के अफ़सर या सामान्य कर्मचारी पटवारी, पंचायत सचिव वगैरह, वगैरह …।जब जिसको जहाँ मौक़ा मिलता है वही कुबेर बनने के रास्ते पर आगे बढ़ जाता है। धन का स्रोत क्या है ?गोरा है या काला है, सुंदर है या कुरूप है, लंबा है या ठिनगा है, मीठा है या खारा है…ऐसी फ़िज़ूल बातें लक्ष्मी का स्पर्श करने वाले लोगों के दिमाग़ नहीं सोचते। यह लोग लक्ष्मी का स्पर्श होते ही सुंदर, विलुप्तप्राय उल्लू की तरह व्यवहार करने लगते हैं। क्या उन्हें यह पता ही नहीं चलता कि दिन में अगर उनकी आंखें माया के आग़ोश में आने के बाद अंधी हो जाती हैं, तब भी करोड़ों आँखें उन्हें हर समय देखती रहती हैं। ज़मीन पर रैंगने से लेकर आसमान में लंबी उड़ान भरने वाले यह उल्लू क्या अपनी से पहली वाली कहानियों से कोई सीख भी नहीं लेते। हर समय रिश्तों की उड़ान प्रदेश के मुखिया के गिरेबान तक झांकती है।तो कभी ये रिश्ते मंत्रियों और नौकरशाहों को चूमते नज़र आते हैं। पर समय के साथ आरोपों से घिरे ऐसे चेहरे ही मुख्यधारा में पहले से ज़्यादा खिले खिले और निखरे-निखरे दिखाई देते हैं। यहाँ पर ख़ास तौर से हम किसी का नाम लेना इसलिए ज़रूरी नहीं समझ रहे हैं क्योंकि सवाल यह सामने आता है कि किसका नाम न लिखें? आख़िर जिसका नाम सामने आ गया वह चोर है और जिसका नाम सामने नहीं आया उसका इज़्ज़तदार बने रहने का सिलसिला जारी है…।तब तक जब तक कोई सरकारी एजेंसी उसको बेनक़ाब करने पर आमादा नहीं होती।

आख़िर क्या हो गया है हमारे देश को। यहाँ ज़ुबान पर हमेशा प्रवचन का मुखौटा लगाकर ‘पूत कपूत तो क्या धन संचय और पूत सपूत तो क्या धन संचय’ जैसे जुमलों का राग अलापा जाता है तो सारा जीवन काले कारनामे कर धन संचय करने में ही समर्पित करने से लोग बाज़ नहीं आ रहे हैं। नेता हों, नौकरशाह हों, व्यवसायी हों या फिर दादा भाई हों … काले कारनामों से दिन के उजालों में झोपड़ी से महलों तक का सफ़र तय करने वाली हर कहानी के पीछे यही सच्चाई है। यही कड़वी सच्चाई जो राष्ट्र को खोखला कर रही है और राष्ट्र भक्ति का ढोंग रच रही है। गरीबों के सीने में खंजर घौंपने वाले देश के असली गुनहगार यही कुबेर हैं जो काली सफ़ेद बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बेशर्मों की तरह फ़र्राटे भरते रहते हैं और समझते हैं कि दुनिया में उनसे बड़े ख़ुशनसीब कोई और नहीं हैं। पर वक़्त किसी का सगा नहीं होता और काले कारनामों की कालिख कभी न कभी इनका मुँह काला कर ही देती है। यह बात और है कि सीख लेने का कोई मौक़ा इन्हें नहीं मिलता और यह अपने कालिख पुते चेहरे में ही कृष्ण को तलाशते रहते हैं और कंस जैसा व्यवहार करते रहते हैं…।

टीवी सीरियल ये रिश्ता क्या कहलाता है… की तरह ही बातें जीवन मूल्यों के इर्द-गिर्द गढ़ी जाती हैं लेकिन रिश्तों का भोंडापन भी आख़िर छिप नहीं पाता। रिश्तों में लगातार ट्विस्ट आते रहते हैं। कभी अच्छी बॉन्डिंग देखने को मिलती है तो कभी ब्रेकअप जैसी ख़बरें आती रहती हैं। चकाचौंध भरे जीवन में कहानियों को गढ़ने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है। और दर्शक भी इसे कुछ सीखने के लिए नहीं देखते बल्कि टाइम पास का एक अच्छा ज़रिया मानकर वे टीवी स्क्रीन के सामने बैठना भी नहीं भूलते। पर्दे पर भी जीवन का खोखलापन भले ही साफ़ नज़र आए लेकिन चकाचौंध आँखों को बंद कर व्यक्ति को अंधा बना देती है।और कभी भी कोई यह समझ नहीं पाता कि … ये रिश्ता क्या कहलाता है ?

Sawalo ke ghere may RAMRAJYA….article by Kaushal kishore Chaturvedi

सवालों के घेरे में रामराज्य …!

कौशल किशोर चतुर्वेदी

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती और कांग्रेस कार्यकर्ता द्वारा दिए गए एक विज्ञापन ने एक बार फिर राम राज्य को चर्चा में ला दिया है।एक बार फिर वही रामराज्य सवालों के घेरे में है जो त्रेता युग से सीता की अग्नि परीक्षा, राम के राजा बनने के बाद सीता के वनवास और फिर सीता के पृथ्वी के आग़ोश में समाकर जीवन को ख़त्म करने के नज़रिए से आम आदमी के मन को बार-बार कचोटता रहा है। कहीं आज फिर उसी रामराज्य की बात तो नहीं हो रही है? या फिर राम के इन फैसलों को ताक पर रखकर रामराज्य के नाम पर सत्ता की छीनाझपटी का खेल एक बार फिर खेला जा रहा है। नंगी आँखों से देखा जाए तो देश की राजनीति पिछले 30 साल से राम के इर्द गिर्द ही सिमटी हुई है। मज़ेदार बात यह है कि राम पर दावा करने वाले सभी जन यह स्वीकार करते हैं कि राम सभी के हैं। और राम की मानें तो वह शरणागत की रक्षा करने में सिद्ध हैं। ऐसे में फिर राम के देश में बार-बार राम के नाम पर घमासान की नौबत आख़िर क्यों आती है?इसका जवाब तलाशने की बजाए राजनीति पूरी तरह श्रीराम को अपने पाले में लाने के लिए एक दूसरे पर कीचड़ उछालने से बाज़ नहीं आती।
निश्चित तौर पर राम भारत के आदर्श पुरूष हैं। और हर राम भक्त के दिल में समाए हुए हैं।फिर इस राम को भाजपा, कांग्रेस और राजनैतिक दल बार-बार राजनीतिक अखाड़े में लाकर आख़िर क्या साबित करना चाहते हैं? और यदि कोई कहता है कि राम हमारे हैं तो यह मुद्दा सिर चढ़कर क्यों बोलने लगता है? जबकि यह बात सभी को मालूम है कि रामराज्य बार-बार नहीं आता।त्रेतायुग में भी रामराज्य सिर्फ़ तभी था जब तक राम राजा थे…उनके उत्तराधिकारियों के समय में भी लगातार स्थितियों में पतन होता रहा और अंतत: युग ही बदल गया। द्वापर-युग आया और कलियुग आ गया। कलियुग में भी राजतंत्र ख़त्म हो गया और लोकतंत्र की नींव रखी गई। राम एक राजा थे और जब देश में राजतंत्र ही ख़त्म हो गया तो फिर राम राज्य की बात क्यों हो रही है? राम राज्य की कल्पना राम के इर्द गिर्द समाई हुई है और लोकतंत्र की कल्पना संविधान के इर्द-गिर्द सिमटी है।फिर आज संविधान के राज्य की बात क्यों नहीं होती? अगर राम राज्य की बात की जाए तो आज़ाद देश में कभी जवाहर का राज्य था, कभी लाल बहादुर शास्त्री का राज्य था, कभी इंदिरा का राज्य था, कभी राजीव का राज्य था, कभी अटल बिहारी का राज्य था, कभी मनमोहन का राज्य था और आज नरेंद्र मोदी का राज्य है। क्या आमजन इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं या फिर राजनेता भी यह बात स्वीकार कर सकते हैं? और यदि यह बात स्वीकार की जाती है तो संवैधानिक व्यवस्था के तहत क्या यह देश के राष्ट्रपति का अपमान नहीं है? या फिर क्या हमें यह नहीं कहना चाहिए कि देश में पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से लेकर आगे बढ़ते हुए अब रामनाथ कोविंद का राज्य चल रहा है।अगर संवैधानिक व्यवस्था की बात करें तो क्या यह प्रश्न तार्किकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता ?
क्या यह बात सही नहीं है कि रामराज्य शब्द का वर्तमान परिस्थितियों में दुरुपयोग मात्र हो रहा है।आज ज़रूरत है अपराध मुक्त समाज की ताकि मासूम बच्चियाँ बलात्कार का शिकार न हो सकें…महिलाएँ भी सिर ऊँचा कर जी सकें…कोई हत्या-आत्महत्या का शिकार न हो, आज ज़रूरत है हर हाथ को रोज़गार की, आज ज़रूरत है महिलाओं के सम्मान की, आज जरूरत है किसानों के कल्याण की, आज जरूरत है मज़दूरों-श्रमिकों के स्वाभिमान की रक्षा की, आज ज़रूरत है सबके दिल में सद्भाव की, आज ज़रूरत है अमीरी ग़रीबी के बीच बढ़ती खाई को पाटने की, आज ज़रूरत है कुपोषण भुखमरी मिटाने की, आज ज़रूरत है नफ़रत को ख़त्म करने की, आज ज़रूरत है भ्रष्टाचार रूपी दानव को दफ़न करने की, आज ज़रूरत है हर आँख के आँसू पोंछने की, आज ज़रूरत है राम के आचरण को आत्मसात करने की…..क्या राम के नाम पर वोट माँगने वाले या रामराज्य की बात करने वाले यह दावा कर सकते हैं कि उनकी सरकार आएगी तो समाज से सारी बुराइयाँ ख़त्म हो जाएँगी और वसुधैव कुटुम्बकम के भाव के साथ अच्छाइयों का डंका पूरी दुनिया में बजने लगेगा? इस बात का जवाब न तो किसी के पास है और न ही कोई देने को तैयार है। फिर आख़िर रामराज्य का मुद्दा आज कितना प्रासंगिक बचा है? कही रामराज्य की बात कर वर्तमान मुद्दों से ध्यान तो नहीं भटकाया जा रहा है। अब अगर ज़रूरत है तो जन-जन के जागरूक होने की…जो संविधान और लोकतंत्र का हवाला दे सकें और राजनेताओं, नौकरशाहों और मनमानी करने वाले आम-ख़ास सभी को हर समय सबक़ सिखाने में सक्षम हो। ताकि देश का हर नागरिक सम्मान के साथ जीवन का निर्वाह कर सके।

Gandhi ji ke teen bandaro ki pukaar reham karo sarkaar…article by Kaushal kishore Chaturvedi

गांधी जी के तीन बंदरों की पुकार…रहम करो सरकार

कौशल किशोर चतुर्वेदी

सरकार एक तरफ़ कह रही है कि प्रदेश में होने वाले उपचुनाव में भाजपा सरकार की उपलब्धियां और विकास चुनावी मुद्दा होगा।दूसरी तरफ़ हाल ही में सरकार के तीन फ़ैसले कहीं न कहीं उसकी उपलब्धियों पर सवालिया निशान ज़रूर लगाएंगे।यह तीन फ़ैसले कहीं न कहीं किसानों, आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं और छोटे दुकानदारों को सीधे तौर पर टारगेट कर रहे हैं।यह बात और है कि प्रभावित होने वाली आबादी गांधी के तीन बंदरों की तरह मुँह, कान और आँख बंद करके सरकार को कोई भी प्रतिक्रिया देने से बचते रहें क्योंकि हमेशा की तरह जनता को हर राज्य में मन मसोसकर ज़हर पीने की आदत हो चुकी है और जनता जान चुकी है कि वही सबसे ज़्यादा मजबूर है।या फिर सरकार और सरकार के नुमाइंदे और पार्टी के लाखों कार्यकर्ता और पदाधिकारी मुँह, कान और आँख बंद करके अपनी उपलब्धियाँ और विकास गिनाते रहें और जनता तालियां पीटती रहे क्योंकि सरकार और जनता के बीच के रिश्ते अब केवल दिखावे तक सीमित हैं और जनता यह जानती है कि सरकार को केवल यही दरकार है कि जनता उन पर फूल बरसाती रहे, सभाओं में तालियाँ बजाती रहे और सरकार ज़िंदाबाद के नारे लगाती रहे।जनता वोट भी ख़ुशी-ख़ुशी दे और सरकार के फैसलों पर दुखी मन से भी गांधी के तीन बंदर बनकर ख़ुशी-खुशी मौन साधे रहे।

इस समय सबसे ज़्यादा चर्चा में है कि कमलनाथ सरकार के समय कन्या विवाह/ निकाह योजना में 28 हज़ार की राशि को बढ़ाकर 51 हज़ार करने के निर्णय को भाजपा सरकार फिर पलटने जा रही है।भाजपा विपक्ष कमें रहते कांग्रेस सरकार पर लगातार आरोप लगाती रही कि कन्याओं को विवाह योजना की राशि नहीं मिली और कांग्रेस सरकार झूठी वाहवाही लूटती रही।कोरोना काल में सरकार को यह हक़ीक़त पता चल गई है कि बजट की कमी के चलते 51 हज़ार की राशि सरकार की रीढ़ की हड्डी को झुका रहे हैं।ऐसे में सरकार कांग्रेस के फ़ैसले को पलटकर उनके समय की शर्तों को फिर लागू करने का मन बना रही है। सरकार के नुमाइंदों की मानें तो संकेत साफ़ हैं कि भाजपा गुमराह नहीं करती और मूल की तरफ़ लौटना लगभग तय है। पर उपचुनाव से पहले यह फैसला जहाँ शिवराज के मामा होकर माँ से दोगुना प्यार भांजियों पर लुटाने के दावे पर सीधा प्रहार करेगा तो आधी आबादी को मामा की सरकार पर चुटकी लेने का मौक़ा भी देगा। हालाँकि हो सकता है कि उस समय गांधी के तीन बंदरों का असर सरकार पर इस क़दर हो कि कुछ न दिखाई दे, न सुनाई दे और सरकार सिर्फ़ अपनी उपलब्धियों और विकास का बखान ही करती रहे।
सरकार का दूसरा फैसला प्रदेश की 70 फ़ीसदी आबादी के प्रतिनिधि किसानों से जुड़ा है।भोपाल सहकारी दुग्ध संघ ने किसानों से दूध ख़रीदी के दाम चार रुपये प्रति किलोग्राम कम कर दिए हैं।दुग्ध सहकारी समितियाँ किसानों से 15 अगस्त तक छह प्रतिशत फैट लेवल वाला एक किलो दूध 36.92 रुपये में खरीद रही थीं।यह क़ीमत अब घटाकर 33.32 रुपये प्रति किलो कर दी है।किसानों से दूध ख़रीदी की क़ीमत में यह कमी एमपीसीडीएफ और राज्य सरकार के निर्देश पर की गई है।अफ़सरों के मुताबिक़ किसान से ख़रीदा गया एक किग्रा दूध उपभोक्ताओं तक पहुँचाने में दुग्ध संघ क़रीब 14.68 रुपये ख़र्च करता है। इसमें पार्लर पर दूध बेचने वाले व्यापारी तक का कमीशन शामिल हैं।दूध ख़रीदी के नए रेट 16 अगस्त से लागू किए गए हैं।अब किसानों से दूध 540 रुपये प्रति किलो फैट के हिसाब से ख़रीदा जाएगा।इसके अनुसार 6% फैट लेवल वाले एक किलो दूध के लिए किसान को 33.32 रुपया का पेमेंट किया जाएगा। यह फैसला भले ही लाखों किसानों से ही जुड़ा क्यों न हो लेकिन इस फ़ैसले की गूँज करोड़ों किसानों के कानों में गूँजती रहेगी। यह किसान हमेशा निर्णायक रहे हैं और अब भी है। गांधी के तीन बंदर बने रहकर भी यह अपनी ताक़त दिखाने से कभी नहीं चूकते। और मज़बूत सरकारों को मजबूर करते इन्हें ज़माना देखता आ रहा है।

तीसरा फैसला छोटे दुकानदारों से जुड़ा है। जो साँची पार्लर चलाकर दूध की मेहरबानी पर रोज़ की जरूरत का सामान बेचकर परिवार की रोटी, कपड़ा और मकान की जुगाड़ कर लेते हैं। इनकी ज़िंदगी और आवाज सिर्फ़ इनकी दुकान की टीनों की चहारदीवारी में क़ैद हैं। सरकार ने फैसला किया है कि हर रोज 100 लीटर से कम दूध बेचने वाले पार्लर का लाइसेंस निरस्त होगा। सरकार का तर्क है कि ऐसे दुकानदार का ध्यान दूध की जगह अन्य सामान बेचने पर ज्यादा है।वजह है कि प्रदेश में दूध का संकलन 15% बढ़ा है, लेकिन कोविड-19 के चलते बिक्री में 13% की कमी आई है। सरकार इन दुकानदारों को आपकी सद्भावना की दरकार है। कोरोना काल में लोगों की क्रय शक्ति घटी है तो बेचारे दुकानदारों का क्या गुनाह है।जिनका लाइसेंस आप निरस्त करेंगे उनकी दशा गांधी जी के तीन बंदरों से भी बदतर है। हो सकता है कि इनके परिवार मजबूर होकर मुँह, कान और आँख बंद करने के साथ नाक भी बंद कर लें।सरकारों को मौत के आँकड़े डराते नहीं हैं और हर मौत को दुखद कहना ही पर्याप्त से ज़्यादा होता है। पर जिनके परिवार का चिराग़ बुझता है, वह परिवार पीढ़ियों तक ऐसे दुख और उसके असर से उबर नहीं पाते।

जनता कोरोना काल में त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही है, ऐसे में मोटी तनख़्वाह लेने वाले अफ़सरों को जनता पर रहम करते हुए फ़ैसलों को सह्रदयता पूर्वक लेने का सोच रखना चाहिए। क्योंकि छोटे छोटे फ़ैसले गरीब आबादी को जीवन-मौत के दोराहे पर लाकर खड़ा कर देते हैं। गांधी के तीन बंदर बनी यह ग़रीब जनता निश्चित तौर पर हर रोज़ सरकार से यही पुकार कर रही है कि दे नहीं सकते तो कम से कम छीनो ही ना सही… ताकि सरकार की जय जयकार कर-कर के ही सही जैसे-तैसे जीवन तो गुज़र जाए।

Sometime you have to miss to be missed….shipra

We have so many people who we feel they are very important for us but the expression is not the same everytime from the other side. Your availability makes people to think that you are always there so they don’t give you that much importance .This never change theirs attitude towards you but you can feel the emotions inside you.It goes same with the suggestion if you suggest something to a person free of cost it is not so important to them on the otherside they give importance to the suggestion in exchange of some cost. Another example if you do extra work at your workplace after some time your so called extra work becomes your duty and because you are easily available you will tend to get more extra work as compared to other colleague in the office and less importance too .So to gain importance you first need to give importance to yourself this is the biggest mistake we do we give importance to work,family,friends  but we forgot to give importance to ourself.

So please give importance to urself first….its very necessary…

That’s why I quoted

Sometime you have to  MISS to be MISSED…

Mujhy chahiye aazadi…angrez gaye rangrez chood gaye ….article by Kaushal kishore Chaturvedi

मुझे चाहिए आज़ादी … अंग्रेज़ गए रंगरेज बचे …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कहने को तो 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हो गया था लेकिन आज़ादी माँगने वाले नारे अभी भी ज़िंदा हैं यानी कि आज़ादी के 73 साल बाद भी।मुझे चाहिए आज़ादी…सीएए से आज़ादी एनपीआर से आजादी एनआरसी से आजादी, शायद कोरोना काल न आता तो यह नारे अब भी पूरे देश की सड़कों पर सुनाई दे रहे होते।फ़िलहाल अब यह चर्चा का मुद्दा नहीं है लेकिन आज़ादी माँगने वाले अब भी ज़िंदा है जो अक्सर आरोप लगाते हैं कि उनकी आवाज़ को दफ़न करने की कोशिश की जा रही है।
यदि 73 साल बाद हम नज़र डालें तो अभी भी शोषण करने वाले और शोषित होने वाले दोनों ही वर्ग समाज में मौजूद है। भले ही इनका रंग बदल गया हो पर ढंग वही हैं। भले ही इनका रुप बदल गया हो पर कुरूपता पहले से ज़्यादा बढ़ी ही है।अंग्रेज़ तो देश से विदा हो गए।और हमारा देश आज़ाद हो गया लेकिन इसके बाद भी 73 साल बाद हम क्या कुरीतियों से आज़ाद हो पाए हैं, क्या ग़रीबी से आज़ाद हो पाए हैं, क्या भेदभाव से आज़ाद हो पाए हैं, क्या हिंसा से आज़ाद हो पाए हैं, क्या शासकों के अपने-अपने एजेंडों से आज़ाद हो पाए हैं, क्या राजनीति , नौकरशाही और अपराधियों के दुष्चक्र से आज़ाद हो पाए हैं…? इन सभी सवालों का उत्तर यही है कि हम चुप्पी साधे रहें वरना हमारी बोलने की आज़ादी के मायने भी निकाले जाने लगेंगे।अगर देखा जाए तो अंग्रेजों के जाने के बाद हमारे देश में रंगरेजों ने अपनी जगह बना ली है।मंच पर जो भी रंगरेज पहुँचता है, वह अपनी रंगों का जादू दर्शकों पर इस तरह बिखेरता है कि मंच पर उसके रहते पूरा देश ठीक उसी तरह सोता रहता है जैसे आज़ादी मिलने के बाद लालक़िले की प्राचीर से भाषण के समय देश की जनता जाग रही थी तो पूरी दुनिया सो रही थी।

ऐ मेरे रंगरेज़ मुझ पे इतनी इनायत कर दे ना
मेरे कोरे दुपट्टे को तू रंगों से अपने भर दे ना

शायद देश के करोड़ों हाथ भिखारी की मुद्रा में देश के मुखिया के सामने बड़ी बड़ी सभाओं में हज़ारों की संख्या में मौजूद रहकर बस यही कामना करते रहते हैं। और उन्हें तब तक होश नहीं आता जब तक कि रंगरेज़ मंच छोड़कर चला नहीं जाता। हम यहाँ पूरे 73 साल का आकलन कर रहे हैं ना कि किसी काल विशेष का।

संविधान में देश के हर नागरिक को मिले कुछ मौलिक अधिकार पर एक नज़र डाल कर हम अपनी बात ख़त्म कर देंगे।

अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता- इसका अर्थ यह है कि राज्य सभी व्यक्तियों के लिए एक समान कानून बनाएगा तथा उन पर एक समान ढंग से उन्‍हें लागू करेगा।

अनुच्छेद 15: धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेद-भाव का निषेध – राज्य के द्वारा धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग एवं जन्म-स्थान आदि के आधार पर नागरिकों के प्रति जीवन के किसी भी क्षेत्र में भेदभाव नहीं किया जाएगा।

अनुच्छेद 16: लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता- राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी। अपवाद- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग।

अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का अंत- अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए इससे दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।

अनुच्छेद 19- मूल संविधान में 7 तरह की स्वतंत्रता का उल्लेख था, अब सिर्फ 6 हैं:
19 (a) बोलने की स्वतंत्रता।
19 (b) शांतिपूर्वक बिना हथियारों के एकत्रित होने और सभा करने की स्वतंत्रता।
19 (c) संघ बनाने की स्वतंत्रता।
19 (d) देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन की स्वतंत्रता।
19 (e) देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता। (अपवाद जम्मू-कश्मीर)
19 (f) संपत्ति का अधिकार।
19 (g) कोई भी व्यापार एवं जीविका चलाने की स्वतंत्रता।
नोट: प्रेस की स्वतंत्रता का वर्णन अनुच्छेद 19 (a) में ही है।

अनुच्छेद 23: मानव के दुर्व्यापार और बलात श्रम का प्रतिषेध: इसके द्वारा किसी व्यक्ति की खरीद-बिक्री, बेगारी तथा इसी प्रकार का अन्य जबरदस्ती लिया हुआ श्रम निषिद्ध ठहराया गया है, जिसका उल्लंघन विधि के अनुसार दंडनीय अपराध है।

अनुच्छेद 24: बालकों के नियोजन का प्रतिषेध: 14 वर्ष से कम आयु वाले किसी बच्चे को कारखानों, खानों या अन्य किसी जोखिम भरे काम पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

अनुच्छेद 25: अंत:करण की और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता: कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म को मान सकता है और उसका प्रचार-प्रसार कर सकता है।

देश की करोड़ों नागरिक उन्हें मिले इन मौलिक अधिकारों पर चिंतन मनन कर यह भलीभाँति निष्कर्ष निकाल सकते हैं की आज़ादी के 73 साल बाद हम कहाँ खड़े हैं? हमें क्या हासिल करना था और हमें क्या हासिल हुआ है? अंग्रेजों के समय हमारी क्या दुर्दशा थी और रंगरेजों के समय हमारी क्या दशा है? निश्चित तौर से इस निष्कर्ष से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि अभी भी हमें आज़ादी मिलनी बाक़ी है। वह दिन तभी आएगा जब सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया … चरितार्थ होकर देश के करोड़ों नागरिकों को एक ही रंग से रंग देगा और वह रंग होगा सभी के सुखी होने का।राष्ट्रीयता के रग-रग में बहने के आनंद का। सभी के सुंदर बनने का और सभी के निरोगी रहने का।

Arjun toh bohot hai,par Krishna kaha hai ….?? article Kaushal Kishore Chaturvedi

अर्जुन तो बहुत हैं , पर कृष्ण कहाँ हैं …?

कौशल किशोर चतुर्वेदी

प्रदेश की राजनीति के समुंदर में धर्म से रंगा एक छोटा सा कंकड़ ही क्यों न फेंक दिया जाए…राजनीतिक लहरें दो भागों में बँटकर ज्वालामुखी का रूप धारण कर लेती हैं।ज़्यादातर समय यह ज्वालामुखी ख़ुद बख़ुद शांत हो जाते हैं लेकिन कई बार नई बहस का जन्म हो ही जाता है।चूंकि मामला हाल ही में होने वाले विधानसभा उपचुनावों का है इसलिए मौक़ा कोई हाथ से जाने नहीं देना चाहता।बात चाहे राम की हो, हनुमान की हो या फिर कृष्ण की और अब अर्जुन की ही सही। राजनैतिक द्वंद युद्ध में कभी अखाड़े में तन पर माटी लपेटे एक योद्धा गरजता है तो कभी दूसरा योद्धा बरसता है लेकिन अंत तक जीत हार का फ़ैसला नहीं हो पाता। आश्चर्य की बात है कि परिणाम न तो किसी के पक्ष में होता है और न ही मैच टाई ही होता है।बल्कि दूसरे दिन का सूरज उगने के बाद फिर से किसी नए रूप में योद्धा मैदान में ही दिखते हैं।

मध्यप्रदेश में फिलहाल उपचुनावों के मद्देनज़र दोनों दलों के बीच अब निर्णायक लड़ाई हिंदुत्व के इर्द गिर्द केंद्रित हो गई है।चाहे राम की बात हो, हनुमान की बात हो या फिर कृष्ण-अर्जुन की बात हो। हनुमान भक्त के रूप में ख़ुद की छवि को देश दुनिया में परोस चुके पूर्व मुख्य मंत्री कमलनाथ ने मध्य प्रदेश में राजनीतिक खेमों में हिंदुत्व और सॉफ़्ट हिंदुत्व जैसे शब्दों को जीवंत कर दिया है। मुख्यमंत्री बनने के बाद कमलनाथ ने छिंदवाड़ा के सिमरिया स्थित उनके द्वारा स्थापित हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना की थी।इस सिद्धेश्वर हनुमान मंदिर में स्थित भगवान हनुमान की 101 फीट ऊँची आकाश-स्पर्श सबसे ऊँची मूर्ति है।इसके बाद उन्होंने राजधानी में धार्मिक पाठ आयोजित कर सबको चौंका दिया था। कांग्रेस सरकार गिरने के बाद राम मंदिर भूमि पूजन के समय हनुमान चालीसा का पाठ कर एक बार फिर उन्होंने धर्म में आस्था को प्रकट किया। और अब कृष्ण जन्माष्टमी पर अर्जुन वेशधारी उनके पोस्टर ने एक बार फिर नई बहस को जन्म दिया है।

पोस्टर का मज़मून यह है: मध्यप्रदेश के विकास के अर्जुन माननीय श्री कमलनाथ जी, पूर्व मुख्यमंत्री एवं अध्यक्ष मप्र कांग्रेस कमेटी की ओर से मप्र की जनता को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ – बधाई।और इसमें कमलनाथ को अर्जुन के वेश में भी खड़ा कर कांग्रेस ने सुनियोजित तरीक़े से भाजपा को शब्द वाण चलाने की खुली चिट्ठी भेज दी।

फिर भाजपा भी मैदान मारने से क्यों चूकती।विपक्ष के नेता के अर्जुन वाले पोस्टर पर गृह मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा ने चुटकी ली कि अर्जुन के समय सेना की ऐसी हालत नहीं हुई थी। फिर उन्होंने शायराना अंदाज में भी तंज कसा कि :
कभी सुंदरकांड करते हैं ,
कभी कृष्ण दरबार सजाते हैं।
कुछ लोग होते हैं ऐसे,
जो हालात देखकर बाजार लगाते हैं।

ख़ैर यह तो हुई राजनैतिक आमोद प्रमोद की चर्चा। पर इसके अलावा भी दोनों दलों के योद्धाओं की तरफ़ से आहुतियां देने का क्रम लगातार जारी रहता है। यह बयानबाज़ी मध्य प्रदेश में होने वाले 27 विधानसभा उपचुनावों के चलते धर्मयुद्ध और नीति-अनीति जैसे शब्दों के साथ हिंदुत्व को भी अपने दायरे में लेकर एक दूसरे का मुँह काला करने से भी बाज़ नहीं आती है।यह तो अच्छा ही है कि राम,कृष्ण और हनुमान की तरफ़ से सीधा कोई बयान आने की स्थिति बनने की कोई गुंजाइश नहीं है वरना किसी एक के पाले में खड़े होने और उसके पक्ष में बोलने की हिम्मत जुटाना उनके लिए भी आसान नहीं होता।
अर्जुन की बात चली तो सेना की बात भी सामने आयी लेकिन किसी की भी नज़र कृष्ण पर नहीं पड़ी। किसी ने भी यह नहीं सोचा कि अर्जुन जैसे धनुर्धार तो सभी दलों में हो सकते हैं।यदि अर्जुन और युद्ध की बात चली है तो पांडव पक्ष और कौरव पक्ष लड़ाई भी सामने आ सकती है। और यदि अर्जुन हैं तो कर्ण जैसे धुरंधर भी होंगे लेकिन युद्ध के निर्णायक कृष्ण की चर्चा करना कृष्ण जन्माष्टमी पर भी किसी ने ज़रूरी नहीं समझा। जबकि यह सबको मालूम है कि कर्ण और अर्जुन युद्ध जिताने वाले चेहरे नहीं है। युद्ध तो कृष्ण ही जिताएँगे।धर्म- अधर्म और नीति-अनीति का निर्धारण भी कृष्ण ही करेंगे।लेकिन वह कृष्ण कहाँ है? और किसके खेमे में हैं। कहीं कृष्ण जनता-जनार्दन के मन में रचे-बसे तो नहीं है? यदि दोनों दल इस बात पर सहमत हों तो मध्य प्रदेश में होने वाले उपचुनावों के परिणाम के बाद इस राज का ख़ुलासा हो ही जाएगा। लेकिन दोनों दल किसी एक बात पर जिस दिन सहमत होंगे, शायद लोकतंत्र का वह आख़िरी दिन ही होगा। सो कृष्ण कहाँ हैं, का प्रश्न हमेशा ज़िंदा रहेगा। पर यह बात तय है कि उपचुनावों के बाद धर्म-अधर्म, नीति-अनीति, राम,कृष्ण, हनुमान, अर्जुन और हिंदुत्व बहस का मुद्दा नहीं रहेंगे।

Apna Post