Yani gaddari toh hui hai….kisne ki janta batayegi

यानि ग़द्दारी तो हुई है … किसने की यह जनता बताएगी …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

मध्य प्रदेश में 28 विधानसभा उपचुनाव क्या रंग दिखाने वाले हैं, इसका फ़ैसला तो 10 नवंबर को ही होगा लेकिन उपचुनावों में आमने-सामने अगर कोई दिख रहा है तो वह हैं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और कांग्रेस सरकार को ज़मीन पर पटककर भाजपा से राज्यसभा सदस्य बने ज्योतिरादित्य सिंधिया। इन दोनों दिग्गज नेताओं के साथ ही उपचुनाव की लहर में ‘ग़द्दारी’ नाम का शब्द लगातार ज़हर घोल रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और कांग्रेस जहाँ ज्योतिरादित्य सिंधिया पर ग़द्दारी करने का आरोप लगा रहे हैं तो राज्यसभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया और भाजपा पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर प्रदेश की जनता के साथ ग़द्दारी करने का आरोप चस्पा कर रहे हैं। यानी कि एक बात साफ़ हो गई है कि ‘ग़द्दारी’ तो हुई है किसने की है, कब की है, कहाँ की है और जनता की राय में कौन गुनहगार है… बस इसका फ़ैसला होना बाक़ी है। 28 विधानसभा उपचुनाव में से किस क्षेत्र के मतदाता किसको ग़द्दार ठहराते हैं यह बात भी बहुत मायने रखती है। फिर दूसरी बात यह भी है कि यदि दोनों दलों को 14-14 सीट मिलती हैं तो क्या निष्कर्ष निकाला जाएगा? क्या कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया दोनों बराबरी से कुसूरवार माने जाएँगे या फिर कांग्रेस-भाजपा दोनों दलों में इस घृणित शब्द का बराबरी से बँटवारा होगा। तीसरी बात कि किसी को 16 और दूसरे दल को 12, या एक को 18 व दूसरे दल को 10, या एक को 20 व दूसरे दल को 8, या कुछ इसी तरह के परिणाम आए तो क्या कम सीटें हासिल करने वाला दल यह मानने को तैयार हो जाएगा कि ग़द्दारी का असल हक़ उसी का है। नहीं, नहीं, नहीं … इस तरह की बात बिलकुल नहीं होगी। पर यह बात सुनने को ज़रूर ही मिलेगी कि जनता ने गद्दारों को सबक़ सिखा दिया है।किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि लोकतंत्र के पावन पर्व विधानसभा चुनाव में ‘ग़द्दार’ और ‘ग़द्दारी’ शब्द का तड़का लगाकर मतदाताओं को उनके अधिकार का सही इस्तेमाल करने के लिए भड़काया जाएगा। पर अब इस शब्द को अपनी ज़ुबान पर लाने वाले बड़े-बड़े नेता खुलकर मतदाताओं को चुनौती दे रहे हैं कि वे असल ग़द्दार को पहचानें और उसके बाद ही मतदान कर यह फ़ैसला करें कि जनता ग़द्दारी को बर्दाश्त नहीं करेगी। वैसे लोकतंत्र की पृष्ठभूमि में यह साबित हो चुका है कि मध्य प्रदेश में हुए एक विधानसभा उपचुनाव में चंबल अंचल में ही व्यक्तिगत तौर पर जब इस शब्द का इस्तेमाल किया गया था तो उसका असर उल्टा ही हुआ था। तब ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के नेता हुआ करते थे और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान थे। पर इन विधानसभा उपचुनावों में यह पहली बार है कि दोनों ही दल के नेता एक-दूसरे पर ग़द्दारी करने का इल्ज़ाम खुलकर लगा रहे हैं।जनता ही जाने कि सही क्या है और ग़लत क्या है? या फिर पूरे समुद्र में ही भांग घुली है या फिर गंगाजल की तरह समुद्र शुद्धता का दावा करता चीख़ रहा है चिल्ला रहा है।

फ़िलहाल जो उपचुनाव के रंग दिख रहे हैं उससे यह साफ़ हो रहा है कि मतदान की तारीख़ आते-आते मध्यप्रदेश की जनता बहुत कुछ नया देख चुकी होगी।कोरोना की विकट परिस्थितियों के बावजूद कि जिस तरह जनता राजनीतिक सभाओं में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं उससे यह बात साफ़ है कि जनता भाजपा सरकार के 15 साल और सात महीने एवं कांग्रेस सरकार के 15 महीने का हिसाब-किताब तैयार कर ही सड़कों पर उतर रही है। फिलहाल शुरुआती रुझानों से यह साफ़ हो चुका है कि दिलचस्प मुक़ाबला उन 25 सीटों पर ही है जहाँ पर वह चेहरे अब भाजपा से मैदान में हैं जो विधानसभा चुनाव 2018 में कांग्रेस से जीतकर विधायक बने थे।अब भाजपा प्रत्याशियों के लिए शिवराज, उनके विकास कार्य, ज्योतिरादित्य सिंधिया और केंद्र की मोदी सरकार मतदाताओं के दिमाग में कितनी असरदार साबित होती है, यह पता लगेगा तो कमलनाथ, उनके काम और उनकी सरकार के गिरने की स्थितियों-परिस्थितियों और इसमें शामिल चेहरों का आकलन जनता किस तरह कर रही है, कांग्रेस के प्रत्याशियों के प्रति मतदाताओं का रुझान इस पर ही निर्भर होगा।कांग्रेस सरकार के गिरने की स्थितियों-परिस्थितियों और प्रदेश में पंद्रह महीने के छोटे से ब्रेक के बाद विस्फोटक वापसी कर भाजपा सरकार बनने के बीच ही उपजा है ‘गद्दारी’ शब्द, जिसको कांग्रेस फ़्लैशबैक में ले जाने से नहीं हिचक रही है तो भाजपा कांग्रेस सरकार की जनता के प्रति जवाबदारी में विफलता से जोड़कर जनता के सामने रख रही है।जनता कहीं मुखर है तो कहीं गुमसुम…पर यह विधानसभा उपचुनाव अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहेंगे, यह साफ़ है।
चेहरों की जहाँ तक बात है तो मुख्य फैसला कमलनाथ और ज्योतिरादित्य के बीच है, काम की जहाँ तक बात है तो कमलनाथ और शिवराज का चेहरा सरकारों के मुखिया के तौर पर आमने-सामने है।बात जब संगठन की आएगी तो एक बार फिर कमलनाथ होंगे जिनके सामने पहली बार के सांसद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा होंगे। बाक़ी स्टार प्रचारक तो प्रचार कर अपना पल्ला झाड़ लेंगे और कानाफूसी में यह भी कह दें कि जैसी करनी, वैसी भरनी तो भी कोई बड़ी बात नहीं। असल ख़ामियाज़ा दो ही चेहरों को भुगतना है, वह हैं कमलनाथ जिन्होंने उपचुनावों के बाद फिर से सरकार बनाने का मन बना लिया है और दूसरे ज्योतिरादित्य सिंधिया जिनका भाजपा में कैरियर उपचुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है। ह्रदय प्रदेश के मतदाताओं के दिल का फैसला ही तय करेगा कि जब मतदान से पहले उनका तापमान मापकर उन्हें वोट डालने की हरी झंडी मिलेगी तब उनका दिल किस तरह धड़केगा और क्या फैसला सुनाने की रज़ामंदी देगा। असल फैसला चंबल-ग्वालियर में ही होना है जहाँ ‘गद्दार’ और ‘गद्दारी’ शब्द नेताओं और मतदाताओं के दिमाग का तापमान मतदान होने तक बढ़ाता-घटाता रहेगा। परिणाम आने के बाद यह फैसला भी हो जाएगा कि 19 जिलों की 28 विधानसभा उपचुनाव सीटों में कोरोना के मरीज बढ़ते हैं या नहीं और नेताओं के प्रयास पार्टी और अपने हित में कितने कारगर साबित होते हैं।

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