Voters standing at the crossroads of democracy and political parties Kaushal Kishore Chaturvedi

लोकतंत्र और राजनीतिक दलों के दोराहे पर खड़ा मतदाता

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कांग्रेस के एक और विधायक प्रद्युम्न सिंह लोधी के विधानसभा से इस्तीफ़ा देने और भाजपा का दामन थामने के साथ ही अब मध्यप्रदेश में 25 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव की राह साफ़ हो गई है। मध्य प्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल न होने के बाद भी 15 साल की भाजपा सरकार को हटाकर कांग्रेस की सरकार बनाने का दम दिखाने वाले कमलनाथ निश्चित तौर से लोधी के इस फ़ैसले से आहत हुए होंगे। तो लोकतंत्र में मतदाताओं द्वारा किसी दल विशेष के लिए चुने गए जनप्रतिनिधियों के ऐसे रवैये से मतदाताओं की मनःस्थिति भी कहीं न कहीं आहत हो रही होगी।हालाँकि भाजपा इसे क्षेत्र के विकास और कल्याण के लिए विधायक का त्याग और समर्पण बता रही है। कांग्रेस जहाँ मध्यप्रदेश में उनकी सरकार गिराने को लोकतंत्र की हत्या क़रार देती है तो भाजपा विधायकों का पाला बदलने को लोकतंत्र को बचाने के लिए जनप्रतिनिधियों का ज़िम्मेदारी भरा रवैया क़रार देती है।फ़िलहाल विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में सरकार गिराने और सरकार बनाने को राजनैतिक दल जहाँ अपनी हुनरमंदी मान कर ख़ुश हो रहे हैं तो कहीं न कहीं मतदाता की मजबूरी यह है कि वह लोकतंत्र और हुनरमंद राजनैतिक दलों के दोराहे पर निरीह मजबूर और मायूस खड़ा है।
मध्य प्रदेश में मतदाताओं के सामने लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए भाजपा और कांग्रेस दो ही विकल्प हैं।वर्ष 2018 में मतदाताओं ने जिन विधायकों को कांग्रेस के टिकट पर चुना था अब दो साल के अंदर ही उनमें से 23 विधायक भाजपा के टिकट पर कमल का फूल लेकर जनता के सामने विकास की दुहाई देकर फिर उन्हें चुनने की अपील करेंगे। चुनने का अधिकार लोकतंत्र में मतदाता को मिला है। मतदाता एक बार फिर गुनेगा और फिर से उसी चेहरे को चुनेगा या नहीं चुनेगा, यह दीगर बात है।पर पूरी प्रक्रिया में कहीं न कहीं मतदाता ही हार रहा है। उसकी पहली हार यह है कि जिस जन प्रतिनिधि को पाँच साल के लिए चुना था उसने उनके भरोसे का खंडन उससे पूछे बिना अपनी धारणाओं के आधार पर किया है।उसके सम्मान की परवाह किए बिना अपने सम्मान का हवाला देकर किया है। विकास के मामले में उसकी राय लिए बिना विकास वाली पार्टी का हवाला देकर किया है।ऐसे में लोकतंत्र में आख़िर ठगा कौन जा रहा है? क्या कहीं न कहीं यह मज़बूत लोकतंत्र का मजबूर मतदाता नहीं है जिसे कभी भी वोट डालने का फ़रमान सुना दिया जाए।और चुनाव पर ख़र्च हुए धन की टोपी मतदाता को पहनाकर जनप्रतिनिधि फिर सिंहासन का वरण कर ले।

सरकार के पास राजस्व की उगाही का अधिकार है। राजस्व की भरपाई के नए- नए तरीक़े सरकारें ईजाद करती हैं। चाहे पेट्रोल डीज़ल पर अतिरिक्त कर हो चाहे बिजली के उपयोग पर अतिरिक्त कर हो या फिर बीड़ी सिगरेट शराब पर राजस्व बटोरे या फिर दूसरे रास्ते हों लेकिन अंतत: सभी रास्ते टेढ़ी-मेढ़ी ऊबड़ खाबड़ गलियों या फिर सीधे, लंबे, चौड़े, बड़े-बड़े गलियारों से होकर नागरिकों तक ही पहुँचते हैं।आख़िर में उनकी ही जेब पर डाका डाला जाता है।ऐसे में क्या इन 23 विधानसभा उपचुनावों पर होने वाला ख़र्च नैतिकता के आधार पर उस राजनीतिक पार्टी को उठाना चाहिए जिसकी सदस्यता जनप्रतिनिधि इस्तीफ़ा देकर पाला बदलकर लेते हैं ?और उप चुनाव में उन्हीं मतदाताओं के सामने हाथ फैलाते हैं जिन्होंने प्रदेश के विकास के लिए उन्हें पाँच साल के लिए चुना था। क्योंकि बदली हुई परिस्थितियों में दल बदल क़ानून भी बेमानी साबित हो रहा है। ऐसे में जर्जर आर्थिक स्थिति से जूझ रही सरकारों को निश्चित तौर पर खर्चीली चुनाव प्रणाली से बचकर विधायकों की अदला बदली करने का कोई न कोई नया रास्ता निकालना चाहिए जिससे आम जनता के सिर पर राजनीतिक दलों की महत्वकांक्षा की मार न पड़े। या फिर दल बदल क़ानून में ही ऐसा कोई प्रावधान कर देना चाहिए कि चुना हुआ जन प्रतिनिधि पाँच साल से पहले फिर से जनता का मत हासिल न कर पाए सिवाय उन परिस्थितियों के जब कोई आपात स्थिति ही पैदा हो गई हो।

सबसे अच्छा विकल्प तो यह है कि विधानसभा में सरकारी पदों पर भर्ती की तरह एक प्रतीक्षा सूची भी जारी की जाए जिसमें प्रावधान हो कि चुना हुआ जनप्रतिनिधि यदि स्वेच्छा से सीट ख़ाली करता है तो दूसरे नंबर का उम्मीदवार बाक़ी बचे हुए समय के लिए विधायक घोषित हो जाए।ठीक उसी तरह जब सरकारी पद पर भर्ती हुआ कोई उम्मीदवार ज्वाइन नहीं करता है तो प्रतीक्षा सूची वाले उम्मीदवार को नौकरी मिल जाती है।ऐसा होने पर विकास के लिए समर्पण और त्याग करने वाले विधायकों की असली और अग्नि परीक्षा हो जाएगी। मतदाता भी ख़ुश रहेंगे, चुने हुए जनप्रतिनिधि भी ख़ुश रहेंगे और प्रतीक्षा सूची वाला उम्मीदवार भी ख़ुश रहेगा। मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के लिए यह विकल्प शायद राजनीतिक दलों के लिए भी सोने पर सुहागा साबित होगा।यदि मध्य प्रदेश में अभी यह विकल्प लागू होता तो कांग्रेस के उम्मीदवारों को चुनाव लड़वाना भाजपा की मजबूरी न हुई होती। जो विधायक नहीं हैं उन्हें मंत्री बनाने की नौबत ही नहीं आती और मसाईदार विभाग भी मूल कैडर वालों को ही मिल जाते। साथ ही हर विधानसभा में भाजपा के क़द्दावर नेता अपनी पार्टी की इस नीति का शिकार न होते। निश्चित तौर पर दूसरे नंबर पर जो हारे हुए भाजपा उम्मीदवार पाँच साल के लिए निर्वासन में थी उन्हें अब मुख्यधारा में आने का अवसर मिल जाता। भाजपा भी ख़ुश होती, भाजपा के खाटी कार्यकर्ता भी ख़ुश होते, विकास के लिए त्याग करने वाले चुने हुए जन प्रतिनिधियों की भी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता और मतदाता भी मायूस नहीं होता। यदि ऐसा होता या भविष्य में ऐसा प्रावधान हो जाए तो चुने हुए जनप्रतिनिधि, राजनैतिक दलों, मतदाता और लोकतंत्र सभी समृद्ध होकर देश-प्रदेश में विकास की गंगा बहाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।सबसे ज़्यादा ख़ुश वही दल होगा जो दूसरे दल के विधायकों का इस्तीफ़ा दिलवाने में सफल होगा।या तो ऐसी झंझटों से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा या फिर विकास के लिए समर्पण करने वाले चेहरे युगों-युगों तक के लिए स्वर्ण अक्षरों में अपना नाम दर्ज करा लेंगे।

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