Vidhayako ko dete thay 5 laakh…janta jaanti hai ki hum bikau nahi…

विधायकों को देते थे 5 लाख … जनता जानती है कि हम बिकाऊ नहीं हैं …?

कौशल किशोर चतुर्वेदी

मंत्री इमरती देवी ने उपचुनाव के दौर में एक संगीन आरोप लगाकर बिकाऊ-टिकाऊ का एक नया फ़ार्मूला सार्वजनिक कर दिया है। इमरती देवी का कहना है कि कमलनाथ कांग्रेस के जो विधायक मंत्री न बन पाए थे उन्हें 5 लाख रुपये महीना क्यों देते थे ? लेकिन वे यह भी सफ़ाई दे रही हैं कि जनता जानती है कि वे बिकाऊ नहीं हैं। मान लें कि बात इतनी सी ही है और बात में सौ फ़ीसदी सच्चाई भी है फिर भी यह बात यहीं पर खत्म होने को राज़ी नहीं लगती। उँगली कहीं न कहीं पूरे सिस्टम की तरफ़ इशारा कर रही है। और चीख़-चीख़ कर कह रही है कि सच्चाई अगर सामने आई तो हमाम में डूबे पूरे सिस्टम की ही क़लई खुल जाएगी। और बिकाऊ की बात चाहे कांग्रेस सरकार का तख्ता पलटने से शुरू हुई हो चाहे विधायक चुनकर मंत्री बनी और ग़ैर विधायक रहकर मंत्री पद की शोभा बढ़ा रही इमरती देवी ने नए तथ्य का ख़ुलासा कर विधायकों को हर महीने पाँच लाख रुपए दिए जाने पर मुहर लगाई हो, कहीं न कहीं गिरेबान जनप्रतिनिधियों की ही गंदी हो रही है। और कई वाजिब सवाल भी मुँह खोले सामने हैं कि यदि विधायक का मुँह बंद रखने के लिए पाँच लाख रुपया महीना और 60 लाख रुपया साल का अघोषित नज़राना पेश किया जाता है तो यह अकूत धन आता कहाँ से है? और यदि विधायक इतनी काली कमाई मुँह बंद रखने के नाम पर कर लेता है तो मंत्री की कमाई कितनी होगी जो वह सरकार का सौम्य चेहरा बनकर जनहित के कामों में जुटे रहने के लिए दिन-रात जी-तोड़ मेहनत करता है? क्या कल के दिन उपचुनावों की बेला में यह क़लई भी खुलने वाली है? हालाँकि कांग्रेस दबी ज़ुबान में सिंधिया समर्थक मंत्रियों की तरफ़ इस तरह का इशारा कर ही चुकी है…बाक़ी है तो दोनों सरकारों में मंत्री इमरती देवी की तरह आँकड़े का ख़ुलासा करने की कि फ़लाँ मंत्री की मासिक अवैध कमाई इतनी और सालाना कमाई इतनी थी या है…। भले ही सबूत पेश न किए जा सकें और कल के दिन बात आई गई हो जाए लेकिन अघोषित सच्चाई तो सबके सामने लाने की औपचारिकता तो पूरी हो ही जाएगी।
हालाँकि मतदाता भी सब जानता है और जनता या अब बच्चा-बच्चा भी इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ है लेकिन सच है कि कभी-कभी नशे की हालत में ही ज़ुबान पर आता है। और नशे का हवाला देकर उसे हवा में उड़ा दिया जाता है। चुनाव के वक़्त मंत्रियों की ज़ुबान से न केवल इस तरह के ख़ुलासे हुए बल्कि साफ़ तौर पर क़ुबूल भी किया गया कि इतने करोड़ ख़र्च कर चुनाव जीत जाऊँगा और इतने करोड़ ख़र्च कर मंत्री भी बन जाऊँगा लेकिन वीडियो वायरल होने के बाद सच्चाई को उसी तरह दफ़न कर दिया गया जिस तरह कोरोना से अपनी जान गंवाने वाले लोगों की देह को या तो तिरस्कार पूर्वक दाह कर दिया जाता है या दफ़न कर दिया जाता है।
मतदाता या जनता भी सब जानती है लेकिन लोकतंत्र का तकाज़ा है कि वह अपनी मजबूरी से पूरी तरह वाक़िफ़ हो चुकी है। मंत्री या विधायक दो मीठे बोल बोलकर जनता को जो इज़्ज़त बख्शते हैं या उनके जो छोटे मोटे काम होते रहते हैं उसके बदले में ही मतदाता अपने जन प्रतिनिधि के प्रति पूरी तरह से निछावर हो जाता है। वह मतदाता जो किसी काम कराने के लायक स्थिति में नहीं पहुँचे हैं वह मतदान से पहले ही अपनी सेवा सुश्रुषा से ख़ुश होकर अपने नेताओं के चेहरों पर अपने मतदान के अधिकार की क़ुर्बानी देने को ख़ुशी ख़ुशी तैयार हो जाते हैं।मंत्री या विधायक उनकी नज़र में एक राजा की तरह ही होते हैं जो अपनी एक झलक दिखाकर भी उनका मताधिकार लेने का पूरा पूरा हक़ छीन लेता है। ख़ुद को सेवक मानने वाले इन कथित राजाओं में मतदाताओं को शहंशाह ही नज़र आता है। जो भले ही वोटों के लिए मीठे बोल बोले या अपनी झोली फैलाए या उनकी झोली भरे लेकिन चुनाव के बाद वह चेहरा ही सर्व शक्तिमान होता है जिसके इशारे पर कलेक्टर-एसपी और पूरा सरकारी तंत्र दौड़ता नज़र आता है। लोकतंत्र और राजतंत्र में इस समय एक झीना सा पर्दा ही हिलता दिखता है।
वैसे भी अब लोक शब्द अपनी दुर्गति पर मरा-मरा जा रहा है। चाहे ‘लोकसेवक’ शब्द हो, चाहे ‘लोकनीति’ या ‘लोकतंत्र’ और ‘लोककल्याण’, सभी में अगर छीछालेदर हो रही है तो सिर्फ़ लोक शब्द की हो रही है। नीतियां बन रही है लेकिन लोक और लोगों के लिए नहीं, तंत्र काम कर रहा है लेकिन लोक के लिए नहीं, सेवक शब्द के साथ जुड़कर लोक लजा रहा है और कल्याण के साथ जुड़कर लोक शब्द कोरोना से जान गँवाने वालों की तरह ज़मीन में दफन होने को मजबूर है। विधायक को चाहे पाँच लाख रुपया महीना दिया जाए और मंत्री चाहे करोड़ों कमाए लेकिन मतदाता तो किसी न किसी प्रत्याशी को अलग-अलग वजहों से मत देने के लिए मजबूर था, मजबूर है और मज़बूर रहेगा।

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