The season of goats has come … thick & thin all are for sale .. article by Shri Kaushal kishore Chaturvedi

बकरों की रुत आई है …मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

नारायण नारायण …
ब्रह्मांड के पहले पत्रकार नारद मुनि नारायण के शयन में जाने के बाद अपनी पत्रकारिता का हुनर निखारने के लिए मृत्युलोक की तरफ़ अपना मुखारबिंद करते हैं। नारायण नारायण कह कर आँख बंद करते हैं और ख़ुद को देवों की भूमि भारत के दिल्ली एयरपोर्ट पर लैंड हुआ पाते हैं। जैसा देश वैसा वेश धारण कर नारद खुद को जींस-टी शर्ट में अस्त व्यस्त एक निराश हताश प्रखर पत्रकार के बतौर पेश करते हैं। देखते हैं कि कोई थर्मल स्क्रीनिंग कर रहा है तो कोई आक्सीमीटर से मानव को तारने वाली आक्सीजन की परख कर रहा है तो कोई बॉटल से द्रव की बूँदों को चरणामृत की तरह आशीर्वाद स्वरूप बाँट रहा है और लोग पीने की जगह हाथ पर मल कर आनंद की अनुभूति कर रहे हैं। सभी मनुष्य अलग अलग क़िस्म के अलग अलग रंगों के वस्त्रों से मुँह को ढाके हैं। नारद जी मन ही मन सोचते हैं कि एक ज़माने में औरतों को ज़माने की बुरी नज़रों से बचाने के लिए इंसान ने बुरक़ा और घूँघट जैसे टोटका अपनाए थे तो अब तो बिना भेदभाव के स्त्री पुरुष बराबरी से मुँह बंद कर मर मर कर जीने को राज़ी हैं। मन की आँखों से नारद राजधानी दिल्ली में इधर उधर नज़र डालते हैं तो पाते हैं कि कोरोना के मारे जनजीवन बुरी तरह अस्त व्यस्त है। लोग हाहाकार कर रहे हैं। मन में राम राम नारायण नारायण शिव शिव अल्लाह अल्लाह यीशु यीशु नानक नानक मालिक मालिक भज रहे हैं लेकिन उन्हें क्या मालूम है कि प्रभु आठ महीने एक पल भी चैन नहीं लेते हैं लेकिन बारिश के चार महीने शयन के समय एक पल भी किसी की बात नहीं सुनते। नर की बात छोड़ो नारद की सुन लैं बोई बड़ी बात है । अब बाक़ी आठ महीने नर भी तो नारायण को एक पल भी चैन नहीं लेने देते।कोई घर से कोई ऑफ़िस से याद करता है कोई मंदिर से याद करता है कोई अस्पताल से वेंटिलेटर से तो कोई ICU से तो कोई जनरल वार्ड से ही टैम बेटैम ऐसे पुकारता है जैसे परमेश्वर नहीं देशी पत्ती की पुड़िया हैं कभी भी जेब से निकालो और फाका लगा लो।ख़ैर प्रभू भी समझते हैं कि टेंशन में मृत्युलोक का मानव पागलों की तरह नाथ नाथ की रट रटता है और जब टेंशन फ़्री होता है तो नाथ अनाथ हो जाते हैं और ख़ुद चर्बी वाला साँड़ बनकर इधर उधर मुहँ मारने से फ़ुरसत नहीं पाता। जिस वजह से अब मुसीका बाँधे घूम रहा है ताकि न मुँह मारे खामोखां और न मुँह जरूरत से ज़्यादा चलाए। ख़ैर प्रभु क्षमाशील है सो गलतियों पर ध्यान ही नहीं देते।
संत कवि रहीमदास जी का बहुत ही प्रचलित दोहा है-
क्षमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्पात।
का रहीम हरी का घट्यो, जो भृगु मारी लात।।
अर्थात उद्दंडता करने वाले हमेशा छोटे कहे जाते हैं और क्षमा करने वाले ही बड़े बनते हैं। ऋषि भृगु ने भगवान विष्णु की सहिष्णुता की परीक्षा लेने के लिए उनके वक्ष पर ज़ोर से लात मारी। मगर क्षमावान भगवान ने नम्रतापूर्वक उनसे ही पूछा, “अरे! आपके पैर में चोट तो नहीं लगी? क्योंकि मेरा वक्षस्थल कठोर है और आपके चरण बहुत कोमल हैं।” भृगु महाराज ने क्रोध करके स्वयं को छोटा प्रमाणित कर दिया जबकि विष्णु भगवान क्षमा करके और भी बड़े हो गए।

दिल्ली में जब नारद पीएम हाउस, मंत्रियों के बंगलों और पार्टी कार्यालयों, पदाधिकारियों के दफ़्तरों और निवास का राउंड ले रहे थे तो अचानक उनके कानों तक यह बातें छन छन कर पहुँच ही गईं कि बकरों की बोली में कंजूसी नहीं। मध्यप्रदेश में 22 बकरों की बोली लगी तब तो सरकार हाथ में आई। राजस्थान के बकरे देखने में मरियल हैं पर चर्बी उन पर ज़्यादा ही चढ़ गई है, हाथ से बार-बार छूट जा रहे, आख़िर कब तक खैर मनाएँगे। ईद तक कटवे खों तैयार रहें वरना फिर गईं साल भर की बातें। एक बार मुहूर्त बिगड़ों सो फिर गाड़ी पटरी पर आने में टैम को का ठिकानों। जो बकरा अबै टटिया में बिढे़ छूट कै कल बेई सींग मारन लगैं।जो खा पी लव है बौ भी पचा लें और डकार भी न लैं। थोड़ा दुखी दुखी भर्राई सी आवाज आई कै वैसे जैसों रेगिस्तान और रेत से भरो है राजस्थान ठीक वैसोई बकरों का हाल है।देखत में मरियल लगें फिर भी घाव करवे में नहीं चूकत ससुरे। अचानक किसी जगह से बकरों की मिमियाने की तेज-तेज आवाज आने लगी तो नारद का ध्यान भटककर उस तरफ़ चला गया। नज़र गई तो एक आलीशान जगह में क़ैद बकरे आपस में गपिया रहे थे कि अब अपन ने तो ख़ूब माल गटक लओ, न लीलवे खों बन रहो न उगलवे खों। बुढवा भी बहुत सख़्त कलेजे को निकरों वरना अब तक तो पूरो माल हाथ आ गओ होतों और दरबार भी सज जातो। देखो मध्यप्रदेश में कितने तेज निकरे वे…दूसरा बकरा बोलो बेई …मान नीय…कै एक बार नंगे होवै से भले न बच पाएँ पर दूसरे झटके में उनने हलाल कर केई छोडौं। फिर कोऊ हथेली नहीं लगा पाओ…अब देखो हर बकरा मालामाल…ख़ूब मस्त हो रए तन, मन और धन सबई सें। नारद जी का माथा ठनका और क्षीरसागर का वह वाक़या उनके दिमाग में घूमा जब लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु को वो मंत्रियों की शपथ का नजारा दिखाओ थो…भरे कोरोना में चिपका चिपकी, हँसी ठिठोली। पूरा माजरा उनकी समझ में आ गया कि कौन से बकरों की और कहाँ की बकरा मंडी की चर्चा हो रही है। और चर्चा करने वालों की बड़ी-बड़ी दाढ़ी के बाल देखकें उनके मन की सारी शंका दूर हो गई।फिर उनने नज़र डेटा पे डाली सो दूध का दूध और पानी का पानी हो गओ। कछु दिन पैलें मध्यप्रदेश में कमलनाथ की सरकार थी पर कोरोना के दरवाजा खटखटाते ही यहाँ कमल खिल गए। और चेहरा तो बेई नज़र आ रहे जो पैले नाथ के साथ खड़े थे पर अब राज के मिज़ाज अलग हो गए।आगे डेटा पे नज़र डाली तो पता चला कि पड़ोसी सटेट राजस्थान में अभी तो गहलोत ही गद्दी पै जमे हैं और खैर मना रहे कि ईद भर निकर जाए फिर हम अपने बकरों पै साल भर कोई आँच न आने देंगे।

अब तो नारद जी का मन मध्यप्रदेश की तरफ़ भटकने लग्यो…नारायण, नारायण रटो और सीधे टपक गए मंत्रालय और विधानसभा के नीचे अदालत के सामने वाली सड़क पे। नजारा देखकैं उनकी आंखें फटी की फटी रैं गईं। यहाँ तो कैऊ बकरा मंडी से निकर क़ैं सड़क पेई बँधे थे…बिकवे के लानैं। मियाँ आपस में बात भी कर रए कै अब बिकनैई है और कटनैई है तो कम से कम अच्छी मोटी बोली ही लगकैं बिके…। कम से कम घर के लोग मालामाल हो जाएँ, अपनी का पूरी उमरई गुज़र गई फ़क़ीरी में। बुढ़ापे में थोड़ौ मज़ा लै लें, फिर उखाड़ लै जीखों जो बनै…पटा लै जो पटानै होय सो। सड़क पै टहल रऐ अच्छन मियाँ ने भी नारद जी के सामने दिल खोल कैं रख दओ, बोले साहब ईद के पैलें बकरों की इतनी ऊँची बोली लग रई हमाए भोपाल में … कि मानो बेगमों के ज़माने में भी नईं लगी जितनी। और अबै अबै दो तौ इतनी ऊँची क़ीमत में गए कै पैले वाले भी पस्त पढ़ गए उनके सामने। अच्छन मियाँ ने मानो जानईं छिड़क दई नारद जी पै। कान के पास मौं लै गए और खुसर पुसर कर कैं बक दओ कि दो तो बिकेई हैं बाईस के भौत दिन बाद लेकिन अबै दो-तीन बकरा और बड़ी बोली पै बिकवे बारे हैं। तुम तौ तैयार रओ ब्रेकिंग ख़बर बनावे खों और जरूरत पड़वे तो अच्छन मियाँ को हवाला भी दै दइयों … अपन कोऊ से डरवे बारे नईयां भैया। जो डर गओ सो मर गओ…। अब देखौ बकरन खौं मरवे को डर लगत का…जब गर्दन पेई छुरा पौंचत तबई लगत कै हो गई ज़िंदगी पूरी। थोरे से मिमियाऊत और खेल खतम। फिर ख़ूब खुशी मनवाऊत पूरे घर भर की ईद पै। ऊके पैले तक तो ख़ूब ख़ात और माल बनकै मंडी में और मंडी के बाहर ख़ूब बुकलात…।वैसे हम आपखौं बताई दें कै मध्यप्रदेश में हम तौ मंत्रालय के पास वाली ई सड़क पै बकरा बाँध कै खड़े हैं लेकिन अब तो विधानसभा और मंत्रालय सबई जगह बकरों की ख़ूब आवाभगत हो रई। लग तो रओ है कि ईद तक कछू बकरा हैं जो मुश्किल से बच पाएँ … भलैंईं कोरोना में सोशल डिस्टेंसिंग में दूर दूर रैकें सेनेटाइज कर कैं बोली लग रईं हों पर ईद तक सबई बकरा बिक जैं। बाक़ी थोडौं बजट भी गड़बड़ा गऔ सरकार को …सो अगली साल भी तो ईद आनै, फिर देखी जै। तब तक कोरोना भी मिट जै और धंधा पानी भी पटरी पे आजै। साल भर भौत होत भैया मालामाल होवै खों।
नारद जी मुस्करा पड़े सो अच्छन मियाँ थोड़े झैंप गए। फिर भी बोले कै अच्छन मियाँ नाम है हमाओ…याद रखियो भैया ख़बर में एकाध जगह हमाओ नाम भी पेल दइयों ताकि आपके संग हमारी भी पूछपरख बनी रै…। फिर बोले अच्छन मियाँ नाम है हमाओ…ध्यान रखियो भूल सैं प्यारे मियाँ न लिख दईयो। ज़ोर के ठहाका लगे अच्छन मियाँ और नारद जी के, काय सैं कै नारद जी ने प्यारे मियाँ की करतूत भी पढ़ लई थी मृत्युलोक के अखबारन में।ठहाके ऐसे लगे कि गूँज मंत्रालय में शिव के कानन तक पौंच गई और वे भी मंद-मंद मुस्करा गए अकेले में। नारायण नारायण जप कै नारद अंतर्धान भऐ सो क्षीरसागर पहुँचे सीधे विष्णु भगवान के सामने। और मृत्युलोक की मसाले भरी रिपोर्टिंग ‘बकरों की रुत आई है …मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं…’ सुनकैं लक्ष्मी विष्णु भी हंस हंस कै लोटपोट हो गए…।

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