Paryatan cabinet,gau cabinet,krishi cabinet…..cabinet ka kad kam ya vishay vishesh par zayada focus…article by Kaushal kishore chaturvediji

पर्यटन कैबिनेट, गौ कैबिनेट, कृषि कैबिनेट … कैबिनेट का क़द कम या विषय विशेष पर ज्यादा फ़ोकस …?

कौशल किशोर चतुर्वेदी
मध्य प्रदेश सरकार ने ग़ौ धन के संरक्षण एवं संवर्द्धन तथा समग्र रूप से निर्णय लेने एवं योजना बनाने के लिए गौ कैबिनेट का गठन किया है। इसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अलावा पाँच अन्य मंत्री गृह मंत्री, वन मंत्री, कृषि मंत्री, पशुपालन मंत्री, पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री शामिल हैं। गोपाष्टमी के अवसर पर प्रथम गौ- कैबिनेट 22 नवंबर को आगर मालवा के गौ-अभ्यारण में होगी।
वहीं सरकार ने पर्यटन मामलों के लिए पर्यटन कैबिनेट का पुनर्गठन किया है। इसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अलावा छह अन्य मंत्री लोक निर्माण विभाग मंत्री, वन मंत्री, वित्त मंत्री, आदिम जाति व अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री, पंचायत ग्रामीण विकास मंत्री तथा पर्यटन मंत्री को शामिल किया गया है।
इससे पहले सरकार ने कृषि कैबिनेट का भी गठन किया है। कृषि कैबिनेट में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अलावा गृह मंत्री, लोक निर्माण कुटीर एवं ग्रामोद्योग मंत्री, जल-संसाधन मछुआ कल्याण तथा मत्स्य विकास मंत्री, किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री को शामिल किया गया है। इनके अलावा सात अन्य मंत्रियों को कृषि कैबिनेट का सदस्य बनाया गया है। कृषि कैबिनेट का काम किसानों और कृषि से जुड़े मामलों को देखना और उसके लिए नीतियां तैयार करना है।

अलग-अलग सेक्टर पर फ़ोकस करने के लिए सरकार अब इस तरह अलग-अलग कैबिनेट बनाने पर फ़ोकस कर रही है। जिसमें कैबिनेट के सभी मंत्रियों की तुलना में गिने चुने मंत्री ही बैठकर फ़ैसले करेंगे और नीतियों का निर्माण करेंगे। क्या इसे ठीक उसी तरह समझा जा सकता है कि जिस तरह डॉक्टर, इंजीनियर, विज्ञान-तकनीकी, शोध आदि क्षेत्रों में आंतरिक तौर पर भी अलग-अलग सेक्टर में विशेषज्ञता पर फ़ोकस किया जाता है, उसी तरह सरकार भी विषय विशेष से जुड़े मंत्रियों को शामिल कर अलग-अलग कैबिनेट के गठन पर फ़ोकस कर ज़्यादा सार्थक परिणाम पाने की कवायद कर रही है।निश्चित तौर से यह सही दिशा में लिए गए फ़ैसले माने जा सकते हैं।

पर सवाल यह भी है कि कहीं इस कवायद के ज़रिए सरकार ज़्यादा मंत्रियों की बेवजह दी जाने वाली राय से बचने का रास्ता तो नहीं ढूंढ रही है। हो सकता है कि बाक़ी मंत्री भले ही इन विभागों से न जुड़े हों लेकिन नीति निर्माण और योजनाओं को बनाने में उनकी राय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हो। ऐसे में सीमित मंत्रियों की कैबिनेट कहीं बेहतर परिणाम पाने के मामले में भी सीमित दायरे में तो नहीं सिमट रही है? सरकार को एक बार इस विषय पर भी विचार-विमर्श ज़रूर करना चाहिए।

दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि जिस तरह कृषि, पर्यटन और गौ कैबिनेट का गठन किया गया है, क्या इसी तर्ज़ पर आगे महिलाओं के मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करने, योजनाएं बनाने, नीतियां बनाने के लिए महिला कैबिनेट, कुपोषण को दूर करने स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर कार्ययोजना बनाने के लिए स्वास्थ्य कैबिनेट, शिक्षा के क्षेत्र में रोज़गारोन्मुखी क़वायद के लिए एजुकेशन कैबिनेट और क़ानून व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए लॉ एंड ऑर्डर कैबिनेट वग़ैरह वग़ैरह के गठन पर भी सरकार विचार कर सकती है। यदि बेहतर परिणाम पाने के लिए अलग-अलग कैबिनेट कारगर साबित होंगी तो क्या अन्य क्षेत्रों में भी बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए अलग-अलग कैबिनेट के गठन को दरकिनार किया जा सकता है ?

एक छोटा सा सवाल और भी सभी के मन में आ सकता है कि इस समय सारे विभागों और सारे विषयों की सेहत को संभालने के लिए सबसे ज़रूरी है प्रदेश की अर्थव्यवस्था की सेहत पर फ़ोकस करना। ऐसे में सरकार को क्या ‘वित्त कैबिनेट’ के गठन पर भी विचार करना चाहिए। ताकि सीमित संख्या में वरिष्ठ और अनुभवी मंत्री और अर्थशास्त्री मिलकर मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में प्रदेश की आर्थिक नीति को सुदृढ़ करने वाली नीतियों और योजनाओं का निर्माण करने में मददगार साबित हो सकें। फिलहाल जिसकी ज़रूरत प्रदेश को शायद सबसे ज़्यादा है।

मूल सवाल यही है कि अलग-अलग कैबिनेट का गठन कहीं कैबिनेट का क़द कम करने की कवायद तो नहीं है। या फिर अलग-अलग विषय और सेक्टर पर ज़्यादा महत्व और विषय विशेष पर ज्यादा फ़ोकस करने की कवायद है। यदि बात विषय विशेष पर बेहतर परिणामों की है तो निश्चित तौर पर कई क्षेत्र खुद के लिए कैबिनेट विशेष के गठन का इंतज़ार कर रहे हैं। ताकि पर्यटन, गौ और कृषि की तरह ही अन्य ज़रूरी क्षेत्र व विषयों पर भी बेहतर नीतियां बनायी जा सकें और बेहतर योजनाओं का निर्माण भी हो सके। जिससे प्रदेश के सभी वर्गों की सेहत सुधर सके। किसान भी ख़ुश हों, नौजवान भी फीलगुड कर सकें, महिलाओं-शिशुओं की भी सेहत सुधर सके, आदिवासी-अनुसूचित जाति की जनसंख्या में भी ख़ुशहाली का अनुभव हो, क़ानून व्यवस्था बेहतर हो और प्रदेश अपराध मुक्त हो सके, और तो और प्रदेश की माली हालत भी सुधरे एवं प्रदेश मालामाल हो सके।

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