Nahi hai haar jeet ka,chunav hai yeh saakh seekh ka …article by Kaushal kishore chaturvediji

नहीं है हार-जीत का, चुनाव है यह साख-सीख का …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

मध्य प्रदेश की 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के लिए आज मतदान का दिन है। यह उपचुनाव साधारण नहीं हैं। चुनाव में प्रत्याशियों की हार-जीत तो होती ही रहती है और इस उपचुनाव में भी मुख्य मुक़ाबला भाजपा-कांग्रेस प्रत्याशियों के बीच में ही हैं।ख़ास बात है तो यह कि कांग्रेस में रहकर क़द और पद से तंदुरुस्ती हासिल करने वाले चेहरे कमल को थामकर अपनी सेहत बनाने का संघर्ष कर रहे हैं। उपचुनावों में हार-जीत से कोई बड़ा बदलाव हाल-फिलहाल होता नज़र आए या भले ही नज़र न आए पर यह चुनाव परिणाम बड़े-बड़े नेताओं की साख पर असर डालेंगे तो मतदाताओं के ज़रिए नेताओं को सीख देते भी नज़र आएँगे, यह बात तय है। यह भी हो सकता है कि मतदाता वह सबक़ सिखा दें जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनके साथ खिलवाड़ करने की सोच से भी नेता डरने लगें। या फिर हो सकता है कि मतदाता ऐसा फैसला सुना दें जिसमें दोनों महत्वपूर्ण दल आइने में देखकर अपनी छवि सुधारने पर मजबूर हो जाएँ और मेकअप के ज़रिए कृत्रिम रूप से सुंदर दिखने के भ्रम से उबरने की एक सीख ले सकें।हालाँकि कई नेताओं की साख पर बट्टा लगना तय है। और जिनकी साख बची भी दिखेगी, उनके दिल में भी उथल-पुथल मची रहेगी। कभी ब्लड प्रेसर बढ़ेगा तो कभी डायबिटीज़ का डर सताता रहेगा।

साख की बात करें तो सबसे महत्वपूर्ण चेहरा ज्योतिरादित्य सिंधिया का सामने है तो सिंधिया घराना भी चुनाव मैदान में है। ग्वालियर-चंबल अंचल की 16 सीटें उनकी साख को सीधे प्रभावित करेंगी। इसी अंचल में उन्होंने दहाड़ मारते हुए पहले कहा था कि अब एक नहीं दो-दो टाइगर हैं यानि शिवराज और महाराज। फिर उपचुनाव में प्रचार के आख़िर में बोले…मैं कुत्ता हूँ जिसने जनता से वफ़ादारी के लिए सरकार गिराई और सरकार बनाई। बमोरी, मुंगावली, अशोकनगर, ग्वालियर, ग्वालियर पूर्व, करैरा, सुमावली, दिमनी,पोहरी, जौरा, डबरा, मेहगांव, गोहद, भांडेर, मुरैना और अंबाह सीटों पर सिंधिया की साख सीधे-सीधे दाव पर लगी है तो साँची, सुरखी और सांवेर सीटें भी साख से आँख दो-चार करने को तैयार हैं। इन 19 विधानसभा सीटों के क़रीब 50 लाख मतदाता पिछले सात महीने से संघर्ष कर रहे हैं कि सिंधिया की साख का फैसला करेंगे और सीख भी देंगे कि उनका फैसला कितना सही था और कितना ग़लत।

सिंधिया के बाद सबसे महत्वपूर्ण नाम है मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का।जिनके सिर पर चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का सेहरा बाँधने का काम किया सिंधिया और उनके साथ भाजपा का दामन थामने वाले 22 उन चेहरों ने, जो अब भाजपा उम्मीदवार बनकर चुनाव मैदान में हैं।शिवराज ने घुटने के बल बैठकर मतदाताओं से मनुहार की है कि यह चुनाव जिताकर उन्हें टेंपररी से परमानेन्ट कर दिया जाए। मतदाता का फैसला अब उनकी साख का फैसला करेगा। कितनी सीटें भाजपा के खाते में आती हैं। भाजपा अपने बूते बहुमत जुटाने और बहुमत से पार कितने पायदान तय कर पाती है, साख का आकलन इससे भी होगा। साख ही क़द, पद और सेहत सबका फैसला करेगी। यही फ़ैसले सीख देंगे कि सही-ग़लत में सही का अनुपात कितना था और ग़लत का कितना?

साख के मामले में तीसरा नाम है कमलनाथ का। जिन्होंने अपनों की ठोकर से ही अपनी कुर्सी गँवाई है। लोकतंत्र की हत्या का बदला लेने का भाव उन्होंने मतदाताओं के मन में जगाने का प्रयास किया है। वह अपने प्रयास में कितने सफल हुए हैं और कितने असफल, यही बताने जा रहे हैं यह उपचुनाव । मतदाता का फ़ैसला या तो उनकी साख में चार चाँद लगाएगा या फिर आईना दिखाएगा कि 15 महीनों के उनके कार्यकाल ने मतदाता ने उनकी साख को कितना आँका है। कांग्रेस उन्हें भले ही भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर रही हो लेकिन मतदाता अब उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं या नहीं, यह उपचुनाव यह भी तय कर उनकी साख का निर्धारण करेंगे।मतदाता यह सीख भी देंगे कि सरकार आख़िर गिरी क्यों और इसको लेकर कमलनाथ की जवाबदारी कितनी बनती है ?

साख उन 12 मंत्रियों की भी दाँव पर लगी है, जिनमें से ज़्यादातर को इसलिए मंत्री बनाया गया कि वह अपनी भी नैया पार कर लें और सरकार को भी किनारे पर लगा दें। सबसे ज़्यादा सीख भी इन्हीं मंत्रियों को मिलने वाली है। साख उन दो पूर्व मंत्रियों की भी दाँव पर लगी है जो कि कांग्रेस सरकार में भी मंत्री थे, भाजपा सरकार में भी मंत्री थे लेकिन चुनाव से ठीक पहले उन्हें संवैधानिक मजबूरी के चलते मंत्री पद छोड़ना पड़ा। इनके अलावा भी उन ग्यारह भाजपा प्रत्याशियों की साख भी दाँव पर लगी है जो कभी कांग्रेस में थे और अब भाजपा के पाले में आकर चुनाव मैदान में हैं।

वक़्त किसकी साख़ बचाता है और किसको सीख देता है, यह फ़ैसला होने जा रहा है। आज 3 नवंबर को लोकतंत्र के इतिहास में रिकार्ड 28 उपचुनाव में अपनी निर्णायक भूमिका निभाने वाला मध्य प्रदेश का मतदाता निश्चित तौर से अहम किरदारों की साख का निर्धारण भी करेगा तो सीख देने के मामले में भी इतिहास बनाएगा। हार-जीत भले ही मायने रखें या न रखें लेकिन साख और सीख अपना असर छोड़कर रहेंगी।

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