Mujhy chahiye aazadi…angrez gaye rangrez chood gaye ….article by Kaushal kishore Chaturvedi

मुझे चाहिए आज़ादी … अंग्रेज़ गए रंगरेज बचे …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कहने को तो 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हो गया था लेकिन आज़ादी माँगने वाले नारे अभी भी ज़िंदा हैं यानी कि आज़ादी के 73 साल बाद भी।मुझे चाहिए आज़ादी…सीएए से आज़ादी एनपीआर से आजादी एनआरसी से आजादी, शायद कोरोना काल न आता तो यह नारे अब भी पूरे देश की सड़कों पर सुनाई दे रहे होते।फ़िलहाल अब यह चर्चा का मुद्दा नहीं है लेकिन आज़ादी माँगने वाले अब भी ज़िंदा है जो अक्सर आरोप लगाते हैं कि उनकी आवाज़ को दफ़न करने की कोशिश की जा रही है।
यदि 73 साल बाद हम नज़र डालें तो अभी भी शोषण करने वाले और शोषित होने वाले दोनों ही वर्ग समाज में मौजूद है। भले ही इनका रंग बदल गया हो पर ढंग वही हैं। भले ही इनका रुप बदल गया हो पर कुरूपता पहले से ज़्यादा बढ़ी ही है।अंग्रेज़ तो देश से विदा हो गए।और हमारा देश आज़ाद हो गया लेकिन इसके बाद भी 73 साल बाद हम क्या कुरीतियों से आज़ाद हो पाए हैं, क्या ग़रीबी से आज़ाद हो पाए हैं, क्या भेदभाव से आज़ाद हो पाए हैं, क्या हिंसा से आज़ाद हो पाए हैं, क्या शासकों के अपने-अपने एजेंडों से आज़ाद हो पाए हैं, क्या राजनीति , नौकरशाही और अपराधियों के दुष्चक्र से आज़ाद हो पाए हैं…? इन सभी सवालों का उत्तर यही है कि हम चुप्पी साधे रहें वरना हमारी बोलने की आज़ादी के मायने भी निकाले जाने लगेंगे।अगर देखा जाए तो अंग्रेजों के जाने के बाद हमारे देश में रंगरेजों ने अपनी जगह बना ली है।मंच पर जो भी रंगरेज पहुँचता है, वह अपनी रंगों का जादू दर्शकों पर इस तरह बिखेरता है कि मंच पर उसके रहते पूरा देश ठीक उसी तरह सोता रहता है जैसे आज़ादी मिलने के बाद लालक़िले की प्राचीर से भाषण के समय देश की जनता जाग रही थी तो पूरी दुनिया सो रही थी।

ऐ मेरे रंगरेज़ मुझ पे इतनी इनायत कर दे ना
मेरे कोरे दुपट्टे को तू रंगों से अपने भर दे ना

शायद देश के करोड़ों हाथ भिखारी की मुद्रा में देश के मुखिया के सामने बड़ी बड़ी सभाओं में हज़ारों की संख्या में मौजूद रहकर बस यही कामना करते रहते हैं। और उन्हें तब तक होश नहीं आता जब तक कि रंगरेज़ मंच छोड़कर चला नहीं जाता। हम यहाँ पूरे 73 साल का आकलन कर रहे हैं ना कि किसी काल विशेष का।

संविधान में देश के हर नागरिक को मिले कुछ मौलिक अधिकार पर एक नज़र डाल कर हम अपनी बात ख़त्म कर देंगे।

अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता- इसका अर्थ यह है कि राज्य सभी व्यक्तियों के लिए एक समान कानून बनाएगा तथा उन पर एक समान ढंग से उन्‍हें लागू करेगा।

अनुच्छेद 15: धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेद-भाव का निषेध – राज्य के द्वारा धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग एवं जन्म-स्थान आदि के आधार पर नागरिकों के प्रति जीवन के किसी भी क्षेत्र में भेदभाव नहीं किया जाएगा।

अनुच्छेद 16: लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता- राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी। अपवाद- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग।

अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का अंत- अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए इससे दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।

अनुच्छेद 19- मूल संविधान में 7 तरह की स्वतंत्रता का उल्लेख था, अब सिर्फ 6 हैं:
19 (a) बोलने की स्वतंत्रता।
19 (b) शांतिपूर्वक बिना हथियारों के एकत्रित होने और सभा करने की स्वतंत्रता।
19 (c) संघ बनाने की स्वतंत्रता।
19 (d) देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन की स्वतंत्रता।
19 (e) देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता। (अपवाद जम्मू-कश्मीर)
19 (f) संपत्ति का अधिकार।
19 (g) कोई भी व्यापार एवं जीविका चलाने की स्वतंत्रता।
नोट: प्रेस की स्वतंत्रता का वर्णन अनुच्छेद 19 (a) में ही है।

अनुच्छेद 23: मानव के दुर्व्यापार और बलात श्रम का प्रतिषेध: इसके द्वारा किसी व्यक्ति की खरीद-बिक्री, बेगारी तथा इसी प्रकार का अन्य जबरदस्ती लिया हुआ श्रम निषिद्ध ठहराया गया है, जिसका उल्लंघन विधि के अनुसार दंडनीय अपराध है।

अनुच्छेद 24: बालकों के नियोजन का प्रतिषेध: 14 वर्ष से कम आयु वाले किसी बच्चे को कारखानों, खानों या अन्य किसी जोखिम भरे काम पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

अनुच्छेद 25: अंत:करण की और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता: कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म को मान सकता है और उसका प्रचार-प्रसार कर सकता है।

देश की करोड़ों नागरिक उन्हें मिले इन मौलिक अधिकारों पर चिंतन मनन कर यह भलीभाँति निष्कर्ष निकाल सकते हैं की आज़ादी के 73 साल बाद हम कहाँ खड़े हैं? हमें क्या हासिल करना था और हमें क्या हासिल हुआ है? अंग्रेजों के समय हमारी क्या दुर्दशा थी और रंगरेजों के समय हमारी क्या दशा है? निश्चित तौर से इस निष्कर्ष से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि अभी भी हमें आज़ादी मिलनी बाक़ी है। वह दिन तभी आएगा जब सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया … चरितार्थ होकर देश के करोड़ों नागरिकों को एक ही रंग से रंग देगा और वह रंग होगा सभी के सुखी होने का।राष्ट्रीयता के रग-रग में बहने के आनंद का। सभी के सुंदर बनने का और सभी के निरोगी रहने का।

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