M for Modi,M for Mama,M for Maharaj and M for MadhyaPradesh article by Shri Kaushal kishore Chaturvedi ji

म से मोदी,म से मामा,म से महाराज,म से मध्यप्रदेश…बाक़ी मौन रहें, मस्त रहें और मंथन करते रहें

कौशल किशोर चतुर्वेदी

‘म’ अक्षर इन दिनों हिन्दी वर्णमाला में सबसे ज़्यादा हिट हो रहा है। राजनीति में अगर देश में इन दिनों सबसे ज़्यादा चर्चा है तो ‘म’ अक्षर से शुरू होने वाले मध्य प्रदेश की। जहाँ कोरोना काल में सरकार जल्दी गिर गई लेकिन मंत्रिमंडल के गठन में मुख्यमंत्री जी को पसीना आ गया। पहले पाँच मंत्री बनाने में एक महीना बीत गया तो पूरी फ़ौज के सेनापति यानि पूरा मंत्रिमंडल सजाने में पूरे सौ दिन गुज़र गए।अब विभागों के बँटवारे की क़वायद जारी है।

मध्य प्रदेश की राजनीति में अगर किसी के इशारे पर एक सरकार गिराकर दूसरी सरकार बनी तो वह देश के मुखिया मोदी के इशारे पर।यह बात खुले तौर पर मंच से स्वीकार की है मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने। प्रधानमंत्री का नाम भले ही न से शुरू होता हो लेकिन उनकी लोकप्रियता ‘म’ अक्षर से शुरू होने वाले उनके सरनेम मोदी से ही है। नारे भी लगते हैं तो मोदी-मोदी के ही।
अब बात करें मध्यप्रदेश के चौथी बार मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान की, जो ख़ुद को मामा संबोधन से पुकारने के लिए मंचों से भी अपील करते हैं और ख़ुश होते हैं कि अब उन्हें भांजे-भांजियाँ ही नहीं बल्कि सभी लोग मामा के नाम से पुकारते हैं। तो मंच के नीचे से आवाज आती है कि अब तो आप जगत मामा हो गए हैं, यह सुनकर मामा और ज़्यादा ख़ुश हो जाते हैं। यह मामा शब्द भी ‘म’ अक्षर से ही शुरू हो रहा है। हालाँकि मामा दुखी हैं कि उन्हें पंचक में आर्डर मिलने पर मजबूरी में शपथ लेनी पड़ी और इसी वजह से मंत्रिमंडल विस्तार में देरी हुई और अब विभागों के बँटवारे की चुनौती से जूझना जारी है। एक पूर्व मंत्री ने खुलकर लिख दिया कि मंत्रिमंडल गठन को लेकर उनकी मजबूरी को जनता नहीं समझ सकती इसलिए अब जबलपुर के प्रभारी मंत्री मुख्यमंत्री जी आप ही बनिए। हवाला भी दे दिया कि इससे पहले दिग्विजय सिंह भी मुख्यमंत्री रहते जिलों के प्रभारी मंत्री की भूमिका में रह चुके हैं।
और अंत में मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण किरदार में अगर कोई है तो वे हैं महाराज यानी राज्य सभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया जिनकी लोकप्रियता भी जन-जन के मन में ‘म’ अक्षर से शुरू होने वाले महाराज शब्द से ही है। महाराज हाल ही में दो दिवसीय दौरे पर मध्यप्रदेश आए थे।पहले दिन खुद को टाइगर बताया तो दूसरे दिन विरोधियों को चील बताकर दिल्ली रवाना हो गए।मंत्रियों की शपथ उनकी मौजूदगी में हुई, अब विभागों के बँटवारे के लिए फिर दिल्ली की दौड़ में महाराज का दिल्ली में होना भी एक वजह है।

ऐसे में मध्य प्रदेश में अगर हिंदी की किताब में ‘म’ से मध्य प्रदेश, ‘म’ से मोदी, ‘म’ से महाराज और ‘म’ से मामा पढ़ाया जाने लगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। क्योंकि प्रदेश का बच्चा- बच्चा अब इन शब्दों से न केवल वाक़िफ़ हो चुका है बल्कि यह सारे शब्द प्रदेशवासियों के रग-रग में समा चुके हैं। मध्य प्रदेश, मोदी, मामा शब्द तो पहले से ही प्रदेश वासियों के मन में समाए हुए थे लेकिन अब महाराज शब्द भी कोरोना काल में प्रदेश की सत्ता नाथ से कमल को हस्तांतरित करवाने में एकल अभिनेता के रूप में महाराज का नाम भी जन-जन की ज़ुबान पर है।और बाक़ी तीन शब्दों की तुलना में इन दिनों सबसे ज़्यादा लाइक और कमेन्ट महाराज शब्द को ही मिल रहे हैं।

अगर वर्णमाला का क्रम लाइक वायरल हिट और कॉमेंट जैसे मापदंडों से निर्धारित होता तो निश्चित तौर पर वर्णमाला में आज ‘अ’ से पहले ‘म’ ने अपनी जगह बना ली होती।यानी पहले पायदान पर ‘म’ का महिमामंडन हो चुका होता।जैसा कभी बिनाका गीतमाला में हर सप्ताह गीतों का पहले पायदान का क्रम बदलता रहता था। या अभी ट्रेंड के आधार पर ट्वीट का क्रम निर्धारित होता है। मोदी की तरह यदि सरनेम के आधार पर लोकप्रियता का आंकलन किया जाए तो मध्यप्रदेश में ‘म’ से मिश्रा यानी मध्य प्रदेश के गृह एवं स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर नरोत्तम मिश्रा को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। मध्य प्रदेश की राजनीति में मामा से भी ज़्यादा किसी की चर्चा इन दिनों अगर हो रही है तो वह डॉक्टर मिश्रा ही हैं। कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश में असल में मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में वह पहले नंबर पर थे, भविष्य में बदलाव होने पर यह पद उन्हें मिल सकता है।पावर सेंटर में भी वह प्रदेश में फ़िलहाल मुख्यमंत्री के बाद पहले नंबर पर हैं। प्रदेश में ऐसे इकलौते नेता हैं जिनके बंगले पर चाय पर मुख्यमंत्री भी पहुँचे और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी।किसी प्रदेश के मंत्री के यहाँ मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री का पहुँचना आम बात नहीं है सो माजरा समझा जा सकता है।हालाँकि डॉ. मिश्रा का क़द पहले से ही बड़ा है, पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष भी केवल उनके बंगले पर ही गए थे। और हाल ही में मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार बनाने का श्रेय उन्हें भी जाता है।

कुल मिलाकर ‘म’ अक्षर की महिमा इन दिनों मध्यप्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण बनी हुई है। कोरोना के मरीज़ों और मौतों का आँकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है। पद और पेशों से जुड़े किरदारों की मानवीय गरिमा और महत्ता भी गिर रही है।मोह नैतिकता और अनैतिकता से परे हो गया है तो मोहभंग जैसी स्थितियाँ भी लगातार निर्मित हो रही हैं।कब किसके सिर पर मद सवार हो जाए और कब किसका मद मिट्टी में मिल जाए, यह सोच से परे है। ‘म’ की महिमा अपरंपार है, ‘म’ से माँ का भान होता है जो जीवनदायिनी है तो ‘म’ से मौत है जो जीवनहरिणी है।फ़िलहाल मानसून मध्यप्रदेश पर मेहरबान है, हम मास्क लगाकर ज़्यादा से ज़्यादा समय मौन रहकर महामारी से बचे रहें और मस्त रहकर कुछ न कुछ मंथन करते रहें। यहाँ हम विष और अमृत की बात नहीं करेंगे।

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