Kisan,gareeb, majdoor aur majboor ko bhi oxygen chahiye

किसान, गरीब, मज़दूर और मजबूर को भी चाहिए ऑक्सीजन …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कोरोना संकट ने पहली बार यह साबित कर दिया है कि भविष्य में ऑक्सीजन को लेकर भी राज्यों में संघर्ष की नौबत आ सकती है। और हो सकता है कि जिस तरह नदियों के पानी के बँटवारे के मामलों में जिस तरह कई राज्यों की दुश्मनी जगज़ाहिर है, ठीक उसी तरह ऑक्सीजन के आदान-प्रदान को लेकर भी राज्य बाँहें ऊपर किए एक-दूसरे के सामने खड़े नज़र आएँगे। यह बात तो हुई मरीज़ों के लिए ऑक्सीजन की तंगी की, जिसके बिना मरीज तड़प – तड़प कर दम तोड़ने को मजबूर होता है। यानि कि ऑक्सीजन के बिना घुटन भरी मौत मरीज का दुर्भाग्य बन जाती है। पर उस घुटन का क्या जो अस्पतालों में ऑक्सीजन की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद घर-घर में किसान, मज़दूर, गरीब और मजबूरों का दम घोंट रही है। यह ऑक्सीजन की कमी वैसे तो हर काल, परिस्थिति और समय में रही है। आजादी के पहले यानि ग़ुलामी के दौर में भी रही है और आजादी के बाद यानि लोकतंत्र व संविधान की दुहाई के समय भी बनी हुई है।ऑक्सीजन की यह कमी कब पूरी होगी, जब गरीब, किसान, मज़दूर के रोटी, कपड़ा और मकान की लड़ाई उसके तन-मन को हर पल तार-तार करने से बाज आएगी। सरकारें मरीज़ों के लिए कृत्रिम ऑक्सीजन की व्यवस्था कर अपनी उपलब्धि का बखान तो कर लेंगी लेकिन गरीब, किसान और मज़दूर मजबूर के मुरझाए, सूखे और झुर्रियों से भरे चेहरों पर ख़ुशहाली लाने वाली ऑक्सीजन की पूर्ति कब होगी … क्या सरकारों के पास इसका जवाब है? शायद नहीं …. पर विडंबना तो यह है कि काग़ज़ों में तो ऐसे सभी चेहरों के आगे कॉलम में ख़ुशहाली सदियों से दर्ज है। और यही सिलसिला अब तक बदस्तूर जारी है।

लोकतंत्र का पर्व जब-जब आता है तो यही किसान, गरीब, मज़दूर और मजबूर इंसान राजनीतिक सभाओं की भीड़ का हिस्सा बनकर अपनी ख़ुशहाली दर्ज कराता है…यह या तो भाग्यविधाताओं को सामने देखने की खुशी होती है या फिर दुखों से भरी घुटन से निजात पाने की छटपटाहट।
फिर लोकतंत्र का महादान मतदान करने से पहले राजनीतिक रंगों से सराबोर गरीब किसान मज़दूर मजबूर मतदाता एक बार फिर ख़ुमारी में कुछ समय अपने चेहरे पर मुस्कान लाने की क़वायद करता है। पर ऑक्सीजन की कमी की गवाही काला पढ़ता उसका चेहरा, गालों की जगह चेहरे के बाहर झांकती उसकी हड्डियाँ और बमुश्किल चालीस साल की उम्र में अस्सी की तरह जर्जर दिखता उसका तन चीख़-चीख़ कर दे ही देता है। पर लोकतंत्र की मर्यादा को अपने कंधे पर उठाए अनपढ़ यह मतदाता एडवांस टेक्नोलॉजी की ईवीएम मशीन तक पहुँचकर अपने मत को ठिकाने तक पहुँचा ही देता है। और एक बार फिर माथे पर हाथ टिकाकर आस लगाता है कि शायद अबकी बार ऑक्सीजन की कमी दूर होगी। शरीर का हर अंग पर्याप्त ऑक्सीजन पाकर स्वस्थ अनुभव करेगा। और उसके चेहरे पर भी वह चमक देखने को मिलेगी जो भाग्यविधाताओं के चेहरे और उनकी टॉप मॉडल की महँगी गाड़ियों पर देखने को मिलती है…।पर आजादी के 73 साल बाद तक नाउम्मीदी ही उसके खाते में आई है।और भाग्यविधाता एक-दूसरे पर आरोपों की झड़ी लगाकर इस गरीब किसान मज़दूर और मजबूर को गुदगुदी कर यह दुस्साहस भी करने से बाज नहीं आते कि वह बंदरबाँट का आनंद लेता रहे और मुँह का निवाला छीनते भाग्यविधाताओं पर नज़र गढ़ाए रहे। यह भी अमिट तथ्य मान ले कि भाग्यविधाता भाग्य लेकर ही पैदा हुआ है और किसान, मज़दूर, गरीब और मज़दूर के हिस्से दुर्भाग्य आया था जिस दिन क़िस्मत का बँटवारा हो रहा था। इसी धारणा के साथ वह अपने पिता, दादा, परदादा और पूर्वजों का चेहरा भी गर्व के साथ लेता रहे कि उन्होंने ही दुर्भाग्य की विरासत को उनकी झोली में डाला है जिसे सँजोए रखना ही उसका परम कर्तव्य है …चाहे युग बदलते रहें, चाहे राजतंत्र हो या लोकतंत्र पर उसके हिस्से में ऑक्सीजन की कमी से घुट-घुटकर जीने का अमिट लेख अजर और अमर है।
सरकारें इन उपलब्धियों पर गर्व करती रहेंगीं कि गरीबों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ग़रीबी रेखा के नीचे बढ़ रहे गरीबों को राशनकार्ड जारी करने और उन्हें एक रुपए किलो गेहूं , दो रुपए किलो चावल दिलाने का हिसाब गिनाने की वाहवाही सरकारें लूटती रहेंगीं। गरीब सड़क बनाएँगे जिन पर भाग्यविधाताओं की महँगी गाड़ियाँ बिना ब्रेक लगाए सरपट दौड़ती रहेंगी। और इन्हीं गरीब मज़दूर किसान और मजबूरों से सुरक्षित रहने के लिए उनकी सुरक्षा का दायरा भी लगातार बढ़ता रहेगा। गरीब ग़रीबी पर गर्व करते रहें और भाग्यविधाता अपने भाग्य पर गर्व करते रहेंगे। ऑक्सीजन का संघर्ष हमेशा सांसें लेता रहेगा।यह सवाल हमेशा विपक्ष के ज़ेहन में रहेगा कि गरीब, मज़दूर, किसान और मजबूरों को ऑक्सीजन की जरूरत है।

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