Jaan zaruri hai …Mask majburi hai article by Kaushal kishore Chaturvediji

जान ज़रूरी है … मास्क मजबूरी है …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कोरोना ने अब यह साबित कर दिया है कि वह सब पर भारी पड़ चुका है।मध्य प्रदेश के सबसे पावरफुल, ज़िंदादिल और निडर मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने भी अब मान लिया है कि जान ज़रूरी है और इसीलिए प्रदेश में चाहे मंत्री, विधायक, सांसद हों या फिर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव, डीजीपी या अन्य अफ़सर और कोई भी हो सभी को मास्क लगाना अनिवार्य है। जो भी मास्क नहीं लगाएगा उस पर कड़ी कार्यवाही होगी।सबसे सुखद पहलू यह था कि प्रेस कॉन्फ़्रेन्स के ज़रिए मुख्यमंत्री के हवाले से सरकार के इस फ़ैसले को जन जन तक पहुँचाते वक़्त गृह एवं संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ख़ुद भी मास्क पहने हुए थे। सामान्यत: कोरोना के उद्भव से लेकर अब तक यह दूसरी या तीसरी बार ही होगा जब मध्य प्रदेश ने मंत्री डॉक्टर मिश्रा को मास्क लगाए हुए देखा होगा। और उससे बड़ा आश्चर्य हैं कि अब वह मास्क लगाते हुए लगातार दिखते रहेंगे।क्योंकि अब मास्क लगाने की नसीहत अफ़सरों से लेकर आम आदमी तक सभी को डॉक्टर मिश्रा ने ही दी है। ऐसे में महात्मा गांधी का वह वाक़या या यूँ कहें कि किसी संत का वाकया स्मरण हो आता है जब किसी बालक को गुड़ न खाने की नसीहत देने से पहले उन्होंने ख़ुद गुड़ खाना छोड़ दिया था। उसके बाद ही बालक को गुड न खाने की नसीहत दी थी। गृह मंत्री डॉक्टर नरोत्तम मिश्रा ने आज इसी बात को चरितार्थ कर दिया है। मास्क लगाकर ही वह प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में पहुँचे। आज मुझे वह शाम भी स्मरण हो रही है जब उनके विधानसभा क्षेत्र दतिया में कोरोना का पहला केस मिलने के बाद तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर नरोत्तम मिश्रा को मास्क का उपयोग करने का आग्रह ख़ुद मैंने भी किया था। हालाँकि तब से अब तक नदी में बहुत पानी बह चुका है और प्रदेश में कोरोना ज़मीन से आसमान पर पहुँच गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय भी अब उनके पास नहीं है।और कोरोना की भयावहता को भी वह प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता के मंत्री होने के नज़रिये से बहुत क़रीब से देख चुके हैं।

वैसे यदि माना जाए तो कोरोना के मामले में मध्य प्रदेश का देश में भले ही 15वाँ नंबर हो लेकिन मध्य प्रदेश में कोरोना को लेकर हाहाकार मच चुका है। सबसे ज़्यादा पीड़ा के दौर से इस समय यदि कोई राजनीतिक दल गुज़र रहा है तो वह ख़ुद सत्ताधारी भाजपा ही बेचारी है।सरकार के मुखिया शिव, संगठन के मुखिया विष्णु, उनके वरिष्ठ सहयोगी प्रदेश संगठन महामंत्री सुहास भगत, मंत्रियों में कमल के पर्याय अरविंद, कांग्रेस सरकार में स्वास्थ्य महकमे के मुखिया रहे और अब जल संसाधन से ओतप्रोत बीमारियों को भगाने वाले पूजनीय नाम के धनी तुलसी सहित तमाम दिग्गज पॉज़िटिविटी से ओतप्रोत होकर स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं।सत्ताधारी गठबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया शायद पहले बड़े नेता थे जो प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनाने और भाजपा सरकार बनाने में पूरे समय पॉज़िटिव रहे और स्वास्थ्य लाभ लेने में भी सबसे पहले नंबर पर रहे। यानी कि महामारी ने भी दल और सत्ता के रुतबे को सिरे से ख़ारिज कर यह जता दिया कि वह किसी से भय नहीं खाती। वहीं विधायकों, आईएएस, आईपीएस सहित अफ़सरों, उनके मातहतों, ग़रीब और अमीर सभी के साथ महामारी निर्ममता के साथ ही पेश आई है। तब जाकर सरकार ने उस कोरोना को सम्मान की नज़र से देखा, जिसको सरकार बनाते समय डरो न, डरो न कह कर चिढ़ाया गया था और उसकी खिल्ली उड़ाई गई थी। उसी कोरोना ने अब सरकार को अपना सम्मान करने के लिए शायद मजबूर कर दिया है।हो सकता है कि कोरोना सम्मान पाकर अब मध्य प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता को निर्भय होकर जीवनयापन करने का वरदान दे दे। और ख़ुद मध्य प्रदेश की धरती से रुखसत होने का कठोर फ़ैसला ले ले।

अगर एक नज़र डालें तो मध्य प्रदेश में कोरोना के एक्टिव केस की संख्या भले ही 8000 के क़रीब हो लेकिन प्रदेश में हुई 800 से ज़्यादा मौतों और संक्रमितों की क़रीब 30 हज़ार संख्या ने मध्य प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता का मनोबल तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सबसे ज़्यादा त्रासदी तो यह है कि बाक़ी बीमारियों में मानवता क़ायम रहती है लेकिन कोरोना से पीड़ित होने के बाद व्यक्ति के लिए मानो पूरी दुनिया ही बेगानी हो जाती है।कसमें वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या, कोई किसी का नहीं है जग में नाते हैं नातों का क्या…गीत का एक-एक बोल मानो कोरोना पीड़ितों के लिए ही लिखा गया था। कोरोना पीड़ित व्यक्ति को न तो उसके परिवार का कोई व्यक्ति छूने की हामी भरता है और न ही परिवार के बाहर का कोई व्यक्ति इसके लिए तैयार होता है। बचाव के सभी उपायों के साथ डॉक्टर और मेडिकल का स्टाफ़ दिल पर पत्थर रखकर भारी मन से ही इलाज मुहैया करता है लेकिन फिर भी वह अनुकरणीय है। बीमारी का सबसे ज़्यादा अमानवीय और इंसानियत को लहूलुहान करने वाला दृश्य तो कोरोना से जान गंवाने वाले इंसान के अंतिम संस्कार का है। जहाँ पति-पत्नी, पिता-पुत्र,माँ-बेटे, पुत्री, भाई-बहन, भतीजे- भतीजी सहित तमाम रिश्ते अपना मोल खो देते हैं। पास खड़ा होने वाला कोई नहीं रहता तो चिता को आग लगाने या शव को दफन करने वाला भी कोई अपना नहीं होता। जन्म-पुनर्जन्म, धर्म, संस्कार और कर्मकांड सब महामारी की बलि चढ़ जाते हैं। शायद कोरोना के इस भयावह दृश्य के सामने ही सरकार ने नत-मस्तक होकर इसे बार-बार नमन करने का मन बनाया है। सरकार ने कोरोना को सम्मान से नवाज़ा है और कोरोना ने सरकार को इंसान को अपने दायरे में रहने और मास्क लगाने का फ़रमान सुनाने पर मजबूर किया है।यानि जान ज़रूरी है तो मास्क मजबूरी है।

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