Haan,Gandhi aur Godse ka desh hai….

हाँ, यह गांधी और गोडसे का देश है …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

भारत, इंडिया और हिंदुस्तान एक ही देश के तीन अलग-अलग नाम है। जिसको जो पसंद हो उस नाम से देश को याद कर सकता है। कोई भारत बोलता है तब भी कोई परहेज़ नहीं है, कोई इंडिया बोल कर संतुष्ट होता है तब भी कोई शिकायत नहीं है और कोई हिन्दुस्तान बोलकर अपनापन महसूस करता है तब भी कोई आपत्ति नहीं है। जिसके मन को जो अच्छा लगे उसी नाम से पुकार ले। उसी नाम का इस्तेमाल अपने लेख में कर ले। न तो देश को कोई आपत्ति है और न ही अब तक देशवासियों को। यह वही देश हैं जहाँ विविधता भरी पड़ी है। जहाँ अलग-अलग धर्म संप्रदाय और विचारधारा के लोग निवास करते हैं। जहाँ उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक पहुँचते-पहुँचते खानपान और पहनावे, भाषा और बोलियाँ एकदम बदली हुई दिखाई पड़ती हैं। कश्मीरी, पंजाबी, तमिल, तेलगू, गुजराती, राजस्थानी, मराठी, हिंदी, बंगाली, उड़िया, उत्तर-पूर्वी सहित अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरह की संस्कृतियाँ परिलक्षित होती है।हिन्दू,मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, आदिवासी, दलित, जैन, बौद्ध सहित सभी धर्म-संप्रदाय के लोग अपने-अपने रीति-रिवाज, सोच, दर्शन और विचारधारा से प्रेरित होकर अपनी-अपनी तरह से जीवन यापन करने को स्वतंत्र हैं। इसलिए देश में विविधता में एकता के विराट दर्शन होते हैं और जिससे देश दुनिया में भारत, इंडिया, हिंदुस्तान को सभी जगह दिल से सम्मान भरी नज़रों से देखा जाता है। यही हमारा गौरवशाली देश है, जिसे दुनिया में महात्मा गांधी का देश माना जाता है और जिसे गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का देश भी माना जाता है। किसी भी दल का नेता इस बात को नकार नहीं सकता है कि भारत गांधी और गोडसे का देश है। एक अद्भुत बात यह भी है कि ऐसा भी नहीं है कि गांधी को मानने वाले गोडसे को घृणा भरी नज़रों से देखते हों। यह वही देश है जहाँ गांधी के जन्मदिन और शहादत दिवस पर उनकी जय-जयकार करने के लिए करोड़ों आवाजें सुनाई देती है तो गोडसे के जन्म और मृत्यु पर हज़ारों लोग खुलकर उसकी भी जय-जयकार करते हैं। यहाँ देश की आज़ादी के 73 साल बाद और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शहादत दिवस के 72 साल बाद भी यह तय नहीं हो पाया है कि गांधी की विचारधारा सही थी या गोडसे की विचारधारा। मज़े की बात यह है कि गांधी की विचारधारा को सार्वजनिक तौर पर नकारने की हिम्मत मुट्ठी भर लोग भी नहीं जुटा पाते हैं तो गोडसे की विचारधारा को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने की हिम्मत भी मुट्ठी भर लोग जुटा ही लेते हैं। यानी कि गांधी की विचारधारा को आत्मा से या मजबूरी में मानने वाले बहुसंख्यकों का देश भारत है तो गोडसे की विचारधारा को आत्मा से स्वीकार करने वाले घोषित तौर पर अल्पसंख्यकों पर अघोषित तौर पर बहुत बड़ी संख्या के लोगों का देश भी भारत है। यह बात देश के सवा सौ करोड़ से ज़्यादा लोग भलीभाँति जानते हैं। यानी कि यह देश अच्छाई में बुराई देखने वाले लोगों को भी सम्मान के साथ जीने का अवसर प्रदान करता है तो बुराई में अच्छाई देखने वाले लोगों को भी सम्मान के साथ रहने का अवसर देता है। क्योंकि यह गांधी और गोडसे का देश है, जहाँ गांधी भी पूजे जाते हैं और गोडसे भी पूजे जाते हैं। शायद यह विविधता में एकता वाले देश में ही संभव है और दुनिया के किसी दूसरे देश में यह संभव नहीं हो सकता। देश में यह विरोधाभासी परंपरा भी नई नहीं बल्कि सनातनी है, जहाँ राम की भी पूजा होती है और रावण की भी पूजा के उदाहरण देखने को मिलते हैं।

गांधी जयंती पर राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गाँधी को याद करते हुए आज इस देश की आँख नम हैं, गमगीन हैं, आँसुओं का सैलाब उमड़ रहा है। देश राम मंदिर बनने की ख़ुशी मना रहा है, धारा 370 हटाने को अपनी उपलब्धि मान रहा है, बाबरी मस्जिद ढहाने के मुक़द्दमे में बरसों बाद सभी के आरोपमुक्त होने से संतुष्ट है लेकिन जब हाथरस में गैंगरेप और बर्बरता से हत्या का मामला सामने आता है और पुलिस पीड़िता के शव को रात में ही ठिकाने लगाकर क़ानून-व्यवस्था नियंत्रण में होने का दावा करती है तो देश की आत्मा कराह उठती है। देश की आत्मा उस समय शर्मिंदगी महसूस करती है जब गांधी और गोडसे की विचारधारा की तरह ही ऐसे मामलों में अनगिनत आवाज़ें मामले के विरोध और बचाव में फ़ौजें बनकर आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। बात जब एक राजनैतिक दल द्वारा शासित राज्य की होती है तो विपक्षी दल अन्याय के ख़िलाफ़ गांधी की विचारधारा से ओतप्रोत दिखाई देते हैं तो सरकार समर्थित लोग गोडसे की विचारधारा बनकर अपनी सरकार के हरसंभव बचाव में मैदान में तलवार लेकर खड़े हो जाते हैं। क्या बलात्कार की घटनाओं में विविधता में एकता की आवाज सामने नहीं आना चाहिए … गांधी और गोडसे का यह देश अब क्या हत्या, बलात्कार और घृणित-जघन्य अपराधों के मामलों में भी दलों में बँटकर देश को दलदल में नहीं धकेल रहा है? शायद आज गांधी ज़िंदा होते तो पीड़िता के परिवार को न्याय मिलने तक आमरण अनशन की घोषणा कर गाँव की सीमा पर बैठकर जान देने पर आमादा हो जाते और गोडसे समर्थक भी यह दावा कर सकते हैं कि गोडसे हाथ में रिवाल्वर लेकर बलात्कारियों की जान लेने के लिए उनके पीछे दौड़ पड़ते …? क़ानून व्यवस्था का न तो दंभ भरते और न ही उपहास करते। गांधी की 151 वीं जयंती पर सरकारों, राजनीतिक दलों और शासन-प्रशासन के नुमाइंदे उनकी मूर्तियों के सामने सिर ज़रूर झुकाते रहेंगे, माला-पुष्प चढ़ाते रहेंगे लेकिन इससे गांधी की आत्मा ख़ुश नहीं होगी बल्कि देश और देशवासियों की दुर्दशा पर गांधी … राम-राम या मरा-मरा रटते हुए जयंती पर ही बार-बार मरने को मजबूर हो रहे होंगे। और यह देखकर शर्मिंदा होंगे कि गांधी हक़ीक़त में मर चुका है केवल दिखावे के लिए ज़िंदा रखा गया है, याद किया जा रहा है ताकि अपनी-अपनी रोटियाँ सेंकी जा सकें। हालाँकि यह देखकर फिर भी उन्हें तसल्ली मिल रही होगी कि देशवासियों के दिलों में गांधी और गोडसे दोनों ज़िंदा हैं, दोनों को दिखावे के लिए ही सही सम्मान भी मिल रहा है और दोनों के प्रति घृणा भरी नज़रों से देखने वालों की भी कमी नहीं हैं। क्योंकि खुद उनकी (गांधी जी की) ही मान्यता थी कि अपराध से घृणा करो अपराधी से नहीं। शायद इस बात को मुख्यधारा के लोगों ने तहेदिल से स्वीकार कर लिया है। मुख्यधारा से दूर बहुसंख्यक आबादी भले ही अपराध और अपराधी दोनों से घृणा करें लेकिन मुख्यधारा के लोग अपराध से घृणा करते हुए अपराधी के प्रति प्रेम दर्शाकर गांधीवादी विचारधारा को भरपूर स्वीकारोक्ति देने में भी पीछे नहीं हटते। चुपके-चुपके गांधी को यह भी दिख रहा होगा।
2 अक्टूबर को लिखा गया कोई लेख पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की चर्चा के बिना पूर्ण होने का दावा नहीं कर सकता। तो शास्त्री जी की जयंती पर उनके विचारों की एक बानगी भी देख ली जाए। शास्त्री की विचारधारा दलगत भावना से पूरी तरह परे थी। शास्त्री जी के समय मध्यप्रदेश के इंदौर से कम्युनिस्ट पार्टी से होमी दाजी सांसद थे। शास्त्री जी के समय पब्लिक सेफ़्टी एक्ट पारित किया गया था, जिसका होमी दाजी ने यह कहकर विरोध किया था कि पुलिस विरोधी दलों के नेताओं के ख़िलाफ़ इस एक्ट का बेजा इस्तेमाल करेगी। शास्त्री जी ने तर्क दिया कि ऐसा नहीं होगा। एक्ट का इस्तेमाल जनता के हित में चोर, उचक्कों और गुंडों को क़ाबू में लाने में होगा। क़ानून पास हो गया। कुछ दिनों बाद इंदौर में किसी आंदोलन के दौरान दाजी को उसी क़ानून का सहारा लेकर गिरफ़्तार कर लिया गया।जब जेल में गिरफ़्तार हुए दाजी को ज़्यादा दिन हो गए तो उन्होंने शास्त्री जी को पत्र लिखकर यह अहसास दिलाया कि इस काले क़ानून का बेजा इस्तेमाल पुलिस द्वारा जनआंदोलनों को कुचलने में किया जा रहा है। आपका भरोसा ग़लत साबित हो रहा है। शास्त्री जी उस समय प्रधानमंत्री थे। उन्हें देश विदेश से हज़ारों पत्र पहुँचते होंगे। फिर भी दाजी का पोस्टकार्ड जैसे ही उन्हें मिला, उन्होंने रात में ही फ़ोन करके इंदौर के अधिकारियों को निर्देश दिए कि दाजी को तुरंत रिहा करो और रिहाई की सूचना तत्काल मुझे फ़ोन पर दो। मैं ख़बर मिलने तक सोने नहीं जाऊँगा। जेलर बेचारा परेशान हो गया। दाजी और उनके सभी साथियों को रिहा करने के बाद सूचना तत्काल दिल्ली भेजी गई और तब जाकर शास्त्री जी सोए। तो यह है दलगत भावना से ऊपर विचार रखने वाले एक प्रधानमंत्री का आदर्श चेहरा। क्या आज राजनीति इस तरह की बची है या फिर सत्ताधारी राजनीतिक दल के नेताओं की विचारधारा शास्त्री जी से मेल खाती है। अपने-अपने दिल पर हाथ रखकर हक़ीक़त से रूबरू हुआ जा सकता है।
खैर अब कौन किसकी विचारधारा की हत्या कर रहा है और किसकी विचारधारा को सम्मान के साथ दिल से लगा रहा है…इस यथार्थ को समझकर सच्चे मन से स्वीकार करने की जरूरत है। यदि विचारधारा ग़लत है तो उसे नकारने की भी हिम्मत जुटाना पड़ेगी। तभी देश गांधी-शास्त्री की विचारधारा को चरितार्थ कर गांधी-शास्त्री की विचारधारा का देश बन पाएगा। हालाँकि फिर भी यह देश गांधी, शास्त्री और गोडसे का कहलाएगा…। वैसे गांधी और शास्त्री आज अपनी जयंती पर विचारधारा के जुमलों पर खेद जता रहे होंगे कि आज विचारधारा की बात वही लोग कर रहे हैं जिनकी ख़ुद की कोई विचारधारा नहीं है। आज इस दल में हैं और कल उस दल में हैं, परसों कोई तीसरा विकल्प भी तलाश सकते हैं। ऐसे में विचारधारा भी लगातार करवटें बदलती रहती है पर लोग हैं कि मानते नहीं और फिर भी विचारधारा की बात कर रहे हैं।

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