Gandhi ji ke teen bandaro ki pukaar reham karo sarkaar…article by Kaushal kishore Chaturvedi

गांधी जी के तीन बंदरों की पुकार…रहम करो सरकार

कौशल किशोर चतुर्वेदी

सरकार एक तरफ़ कह रही है कि प्रदेश में होने वाले उपचुनाव में भाजपा सरकार की उपलब्धियां और विकास चुनावी मुद्दा होगा।दूसरी तरफ़ हाल ही में सरकार के तीन फ़ैसले कहीं न कहीं उसकी उपलब्धियों पर सवालिया निशान ज़रूर लगाएंगे।यह तीन फ़ैसले कहीं न कहीं किसानों, आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं और छोटे दुकानदारों को सीधे तौर पर टारगेट कर रहे हैं।यह बात और है कि प्रभावित होने वाली आबादी गांधी के तीन बंदरों की तरह मुँह, कान और आँख बंद करके सरकार को कोई भी प्रतिक्रिया देने से बचते रहें क्योंकि हमेशा की तरह जनता को हर राज्य में मन मसोसकर ज़हर पीने की आदत हो चुकी है और जनता जान चुकी है कि वही सबसे ज़्यादा मजबूर है।या फिर सरकार और सरकार के नुमाइंदे और पार्टी के लाखों कार्यकर्ता और पदाधिकारी मुँह, कान और आँख बंद करके अपनी उपलब्धियाँ और विकास गिनाते रहें और जनता तालियां पीटती रहे क्योंकि सरकार और जनता के बीच के रिश्ते अब केवल दिखावे तक सीमित हैं और जनता यह जानती है कि सरकार को केवल यही दरकार है कि जनता उन पर फूल बरसाती रहे, सभाओं में तालियाँ बजाती रहे और सरकार ज़िंदाबाद के नारे लगाती रहे।जनता वोट भी ख़ुशी-ख़ुशी दे और सरकार के फैसलों पर दुखी मन से भी गांधी के तीन बंदर बनकर ख़ुशी-खुशी मौन साधे रहे।

इस समय सबसे ज़्यादा चर्चा में है कि कमलनाथ सरकार के समय कन्या विवाह/ निकाह योजना में 28 हज़ार की राशि को बढ़ाकर 51 हज़ार करने के निर्णय को भाजपा सरकार फिर पलटने जा रही है।भाजपा विपक्ष कमें रहते कांग्रेस सरकार पर लगातार आरोप लगाती रही कि कन्याओं को विवाह योजना की राशि नहीं मिली और कांग्रेस सरकार झूठी वाहवाही लूटती रही।कोरोना काल में सरकार को यह हक़ीक़त पता चल गई है कि बजट की कमी के चलते 51 हज़ार की राशि सरकार की रीढ़ की हड्डी को झुका रहे हैं।ऐसे में सरकार कांग्रेस के फ़ैसले को पलटकर उनके समय की शर्तों को फिर लागू करने का मन बना रही है। सरकार के नुमाइंदों की मानें तो संकेत साफ़ हैं कि भाजपा गुमराह नहीं करती और मूल की तरफ़ लौटना लगभग तय है। पर उपचुनाव से पहले यह फैसला जहाँ शिवराज के मामा होकर माँ से दोगुना प्यार भांजियों पर लुटाने के दावे पर सीधा प्रहार करेगा तो आधी आबादी को मामा की सरकार पर चुटकी लेने का मौक़ा भी देगा। हालाँकि हो सकता है कि उस समय गांधी के तीन बंदरों का असर सरकार पर इस क़दर हो कि कुछ न दिखाई दे, न सुनाई दे और सरकार सिर्फ़ अपनी उपलब्धियों और विकास का बखान ही करती रहे।
सरकार का दूसरा फैसला प्रदेश की 70 फ़ीसदी आबादी के प्रतिनिधि किसानों से जुड़ा है।भोपाल सहकारी दुग्ध संघ ने किसानों से दूध ख़रीदी के दाम चार रुपये प्रति किलोग्राम कम कर दिए हैं।दुग्ध सहकारी समितियाँ किसानों से 15 अगस्त तक छह प्रतिशत फैट लेवल वाला एक किलो दूध 36.92 रुपये में खरीद रही थीं।यह क़ीमत अब घटाकर 33.32 रुपये प्रति किलो कर दी है।किसानों से दूध ख़रीदी की क़ीमत में यह कमी एमपीसीडीएफ और राज्य सरकार के निर्देश पर की गई है।अफ़सरों के मुताबिक़ किसान से ख़रीदा गया एक किग्रा दूध उपभोक्ताओं तक पहुँचाने में दुग्ध संघ क़रीब 14.68 रुपये ख़र्च करता है। इसमें पार्लर पर दूध बेचने वाले व्यापारी तक का कमीशन शामिल हैं।दूध ख़रीदी के नए रेट 16 अगस्त से लागू किए गए हैं।अब किसानों से दूध 540 रुपये प्रति किलो फैट के हिसाब से ख़रीदा जाएगा।इसके अनुसार 6% फैट लेवल वाले एक किलो दूध के लिए किसान को 33.32 रुपया का पेमेंट किया जाएगा। यह फैसला भले ही लाखों किसानों से ही जुड़ा क्यों न हो लेकिन इस फ़ैसले की गूँज करोड़ों किसानों के कानों में गूँजती रहेगी। यह किसान हमेशा निर्णायक रहे हैं और अब भी है। गांधी के तीन बंदर बने रहकर भी यह अपनी ताक़त दिखाने से कभी नहीं चूकते। और मज़बूत सरकारों को मजबूर करते इन्हें ज़माना देखता आ रहा है।

तीसरा फैसला छोटे दुकानदारों से जुड़ा है। जो साँची पार्लर चलाकर दूध की मेहरबानी पर रोज़ की जरूरत का सामान बेचकर परिवार की रोटी, कपड़ा और मकान की जुगाड़ कर लेते हैं। इनकी ज़िंदगी और आवाज सिर्फ़ इनकी दुकान की टीनों की चहारदीवारी में क़ैद हैं। सरकार ने फैसला किया है कि हर रोज 100 लीटर से कम दूध बेचने वाले पार्लर का लाइसेंस निरस्त होगा। सरकार का तर्क है कि ऐसे दुकानदार का ध्यान दूध की जगह अन्य सामान बेचने पर ज्यादा है।वजह है कि प्रदेश में दूध का संकलन 15% बढ़ा है, लेकिन कोविड-19 के चलते बिक्री में 13% की कमी आई है। सरकार इन दुकानदारों को आपकी सद्भावना की दरकार है। कोरोना काल में लोगों की क्रय शक्ति घटी है तो बेचारे दुकानदारों का क्या गुनाह है।जिनका लाइसेंस आप निरस्त करेंगे उनकी दशा गांधी जी के तीन बंदरों से भी बदतर है। हो सकता है कि इनके परिवार मजबूर होकर मुँह, कान और आँख बंद करने के साथ नाक भी बंद कर लें।सरकारों को मौत के आँकड़े डराते नहीं हैं और हर मौत को दुखद कहना ही पर्याप्त से ज़्यादा होता है। पर जिनके परिवार का चिराग़ बुझता है, वह परिवार पीढ़ियों तक ऐसे दुख और उसके असर से उबर नहीं पाते।

जनता कोरोना काल में त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही है, ऐसे में मोटी तनख़्वाह लेने वाले अफ़सरों को जनता पर रहम करते हुए फ़ैसलों को सह्रदयता पूर्वक लेने का सोच रखना चाहिए। क्योंकि छोटे छोटे फ़ैसले गरीब आबादी को जीवन-मौत के दोराहे पर लाकर खड़ा कर देते हैं। गांधी के तीन बंदर बनी यह ग़रीब जनता निश्चित तौर पर हर रोज़ सरकार से यही पुकार कर रही है कि दे नहीं सकते तो कम से कम छीनो ही ना सही… ताकि सरकार की जय जयकार कर-कर के ही सही जैसे-तैसे जीवन तो गुज़र जाए।

Leave a Comment

Do NOT follow this link or you will be banned from the site!