Gaddar ke baad ab gareeb ki upvachno ki dhamakedar entry….

‘ग़द्दार’ के बाद अब ‘गरीब’ की उपचुनावों में धमाकेदार एंट्री …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

मध्य प्रदेश के उपचुनावों में अब ‘गद्दार’ शब्द के बाद ‘गरीब’ शब्द की धमाकेदार एंट्री हो गई है। गरीब होना गुनाह है #तो मैं भी शिवराज…सोशल मीडिया पर भाजपा का कैंपेन ट्रेंड कर रहा है। सीएम शिवराज को नंगा-भूखा कहने के कांग्रेस नेता के बिगड़े बोलों को भाजपा ने अब कैंपेन बना लिया है। लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “मैं भी चौकीदार” अभियान की तर्ज पर भाजपा ने मध्यप्रदेश के 28 विधानसभा उपचुनाव में “मैं भी शिवराज” कैंपेन का आग़ाज़ कर दिया है। यह भाजपा की “ग़द्दार” शब्द का बेहतर विकल्प तलाशने की क़वायद भी मानी जा सकती है तो उपचुनावों में आपदा में अवसर तलाशने का एक बेहतरीन उदाहरण भी। खैर मध्यप्रदेश के उपचुनाव हर दिन कुछ नए की तलाश में आँखें गढ़ाए हुए हैं। और मूल मुद्दे मतदान का दिन आने तक पंख लगाकर फुर्र हो जाएँ और चुनावों की तस्वीर एकदम बदली नज़र आए तो कोई बड़ी बात नहीं है। फिलहाल तो सबकी नज़रें इसी अभियान पर टिकी हैं। कौन-कौन बड़ा नेता इस अभियान का हिस्सा बनता है और कौन नहीं … आगे की ख़बरों का ट्रेंड इस पर टिका नज़र आएगा। कैंपेन गरीबों को भावनाओं में बहा पाता है और भाजपा के पक्ष में माहौल बना पाता है या नहीं, यही इस कैंपेन की सफलता या असफलता तय करेगा।
फिलहाल कांग्रेस ने पलटवार किया है। कांग्रेस ने निशाना साधा है कि जो लोग आज खुद को बढ़-चढ़कर गरीब बता रहे हैं , भूखा-नंगा बता रहे हैं ,उन्होंने 15 वर्ष प्रदेश की जनता को लूट-खसोट कर खुद को भला-चंगा बना लिया और जनता को गरीब और भूखा ही छोड़ दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि शिवराज व भाजपा के पास कोई मुद्दा नहीं बचा है इसीलिए वह चुनाव को विकास के मुद्दों की बजाय भावनात्मक मुद्दों पर ले जाना चाहते हैं।एक बयान को भाजपा व शिवराज मुद्दा बनाने का काम कर रहे हैं और चुनाव को उस ओर मोड़ने का प्रयास कर रहे हैं , तो वह यह जान लें कि प्रदेश की जनता बहुत समझदार है और भाजपा की इस घृणित राजनीति को भलीभांति समझती है व चुनाव में इसका भाजपा को कड़ा जवाब भी देगी।
खैर जनता और गरीब क्या जवाब देंगे, इसका ख़ुलासा तो 10 नवंबर को हो ही जाएगा। लेकिन इससे पहले तो यही बात सही है कि 3 नवंबर के पहले कैंपेन के ज़रिए कौन बाजी मार पाता है। सो भाजपा ने कांग्रेस के ‘ग़द्दार’ अभियान से पार पाने के लिए ‘गरीब’ अभियान को मैदान में उतार दिया है। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि गरीब होना तो वाक़ई गुनाह है। और यह बात भी साफ़ है कि राजनीति में एंट्री करते वक़्त भले ही नेता गरीब परिवार से रहा हो लेकिन राजनेता बनने और बड़े- बड़े पदों को धारण करने वाला कोई भी नेता गरीब नहीं होता। हाँ यह बात भी साफ़ है कि नेताओं की अमीरी कहीं न कहीं गरीब मतदाताओं की मेहरबानी ही होती है। विडंबना यह है कि फिर भी राजनीति के केंद्रबिंदु में हमेशा गरीब ही होता है। मज़ेदार बात यह है कि अमीर नेताओं की ज़ुबान पर गरीब शब्द इस तरह चढ़ा रहता है कि गरीबों को हर हाल में रिझाने में वे सफल हो ही जाते हैं। मतदान करने वालों की सर्वाधिक संख्या गरीबों की ही होती है और हर चुनाव के बाद गरीबों की संख्या में बढोतरी भी ख़ूब फलती फूलती है। नेता हमेशा दिल खोलकर संघर्ष करता है कि ज़्यादा से ज़्यादा गरीबों को ग़रीबी रेखा का राशन कार्ड मिल जाए, उन्हें एक रुपया-दो रुपया प्रति किलो में गेहूँ, नमक भी मिल जाए और गरीबों के हित में अच्छी से अच्छी योजनाएँ भी बन जाएँ। ताकि गरीब पेट भरें और नमक का क़र्ज़ अदा करने की बात उनके ज़ेहन में ज़िंदा रहे।पर गरीबों की संख्या न बढ़े और ग़रीबी देश से मिट जाए, ऐसा सफल प्रयास अभी तक तो कभी भी नहीं हो पाया। आगे भी हो पाएगा, इसकी संभावनाएँ दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही हैं। हाँ यह बात अलग है कि गरीब अपनी संख्या में इज़ाफ़ा होने के साथ-साथ समझदार होते जा रहे हैं और वह सभी सुविधाएँ पाने की हरसंभव कोशिश में लगे रहते हैं जो उनकी ग़रीबी के बोनस में उन्हें हासिल हो सकती हैं। सो हैलिकॉप्टर और लग्ज़री गाड़ियों में बैठकर ज़्यादा से ज़्यादा सुरक्षा व्यवस्था से घिरा नेता जब उन तक पहुँचकर उनकी ग़रीबी का ज़िक्र जितना खुलेमन से करता है, वे मन ही मन मुस्कुराकर उसे उतने ही ज़्यादा ग़ौर से सुनते हैं और घर जाकर यह भी गुनते हैं कि ज्यादा बोनस मिलने की संभावनाएँ कहाँ ज्यादा हैं? क्योंकि यह वे भी खुलेमन से जान चुके हैं कि ग़रीबी का कलंक उनके माथे से मिटने वाला नहीं है सो भला इसी में है कि मस्त रहो और अपनी ग़रीबी में ही व्यस्त रहो। चुनावी त्यौहारों का भी भरपूर मज़ा लूटो और पहले मतदान की लाइन में मन से लगो, फिर राशन की लाइन, फिर दारू की दुकान की लाइन, अस्पताल की लाइन, थाना-कोर्ट कचहरी की लाइन और फिर श्मसान की लाइन में लगने का माद्दा भी रखो।

गरीब को अपने मुक़द्दर पर पूरा भरोसा है। कांग्रेस और भाजपा या अन्य राजनीतिक दलों का जन्म तो लोकतंत्र में हुआ है, ग़रीबी और गरीब तो राजतंत्र में भी ख़ूब फले फूले और युगों-युगों से हज़ारों सालों से अमरबेल की तरह समाज में ज़िंदा रहे हैं। उन्हें भी यही फ़िक्र ज्यादा सताती रहती है कि जब गरीब नहीं रहेंगे तब राजनीति का क्या होगा…?

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