Chirayu ki atma ka chitrakar by Kaushal kishore Chaturvedi

चिरायु की आत्मा का चीत्कार …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

इस आलेख के ज़रिए हम किसी की व्यक्तिगत भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना चाहते लेकिन हमारा मानना है कि इमारतों का भी अपना ज़मीर होता है। ऐसे में शुरु से विवादों में उलझी चिरायु अस्पताल की वेदना को शब्द देने की हमने एक कोशिश की है।मानो चिरायु अस्पताल खुद अपना दर्द बयां कर रहा है कि जब-जब मध्यप्रदेश में झमाझम बारिश होती है और मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की बड़ी झील का पेट भरने के बाद वह डकार लेती है, तब-तब अगर किसी के पेट में ज़िंदगी को मौत के सामने खड़ा कर देने वाला बेतहाशा दर्द होता है तो वह हूँ मैं यानि चिरायु…। नाम के विपरीत ऐसा लगता है कि अब मेरी बहुत ही अल्प आयु बची है। पर अंत में नाम विजयी होता है और चिरायु यानि मेरे चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान बिखरकर वार्डों में भर्ती अर्थ और व्यर्थ की मार झेल रहे मरीज़ों को दिलासा देने की मायूस करने वाली एक कोशिश ज़रूर करता हूँ। सफल या असफल कोशिश … यह बात अब मुझे बेमानी लगने लगी है।
पर एक सुखद बारिश के असंख्य दुख झेलने के बाद मैं फिर साल भर अगली बारिश तक मौन साध यही अभिशाप देता हूँ कि इंद्र तुम अपनी औक़ात में रहना ताकि अगली साल फिर हमारे दुश्मन बड़ी झील के पानी को हमारे आँगन में देखकर बेवजह विलाप कर हमारी उम्र को नज़र न लगा सकें। वैसे तो हमारा कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता लेकिन (वि)पक्षी चीं-चीं कर हमारा कान फोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते। कभी-कभी तो हमारी आत्मा ही चीत्कार करने लगती है कि किस घड़ी में हमारा जन्म हुआ था कि जब देखो तब हमारा वैभव पानी के स्पर्श करते ही पानी-पानी होने लगता है।लगता तो यह है कि चुल्लू भर पानी में डूबकर ख़ुदकुशी कर लूँ लेकिन पानी ही बार-बार दिलासा देता है कि चिंता मत करो, धैर्य रखो…हमारे जाते ही तुम्हारे शत्रुओं के अरमान बड़ी झील के पानी में स्वाहा हो जाएँगे। बस पानी की यही अदा हमारे मन को सदा से भा रही है। और हम चिरायु हैं और हमारे विरोधियों की चिल्लपौं अल्पायु…अब मुझे भी कुछ-कुछ यह समझ में आने लगा है।

पर मानो यह साल हम पर दोहरी मार करने से बाज़ नहीं आया। कोरोना की मार और बड़ी झील के पानी की मार, इस दोहरी मार और हमलावरों के अंतहीन हमलों से हमारी साँस थम सी रही है, गला रुँध रहा है और मानो मैं वेंटिलेटर पर दिन गिन रहा हूँ।हमें कोविड-19 अस्पताल घोषित किया गया है तो अब लोग चाह रहे हैं कि इसकी पूरी जांच हो।भाई का बात की जाँच…भाजपा हो या कांग्रेस मुख्यमंत्री, मंत्री, पूर्व मंत्री, विधायक, संगठन, सत्ता, विपक्ष-पक्ष हम बिना भेदभाव के दिन-रात सेवा कर रहे लेकिन लोग हैं कि उँगली उठाने से बाज नहीं आते।कभी-कभी तो लगता है कि हमारी कुंडली में अपयश स्थायी शत्रु के स्थान पर कुंडली मारकर बैठा है।मानो यही अपयश ही काल बनकर हमारी अकाल मौत बनने को आतुर है। हमें भूषण के मुकदमा से ज़रूर हिम्मत बंधी है कि एक न एक दिन ज़रूर एक रुपया में हमारे भी सारे गुनाह इसी बड़ी झील के पानी में धुल जाएँगे। एक बात और कि नदी का पानी बाढ़ में जिन-जिन घरों में घुसता है, कोई भी यह बता दे कि क्या वे सब नदी की जगह पर बने हैं? हमारे अस्पताल में पानी की बात का बतंगड़ तो लोग ऐसा बनाते हैं कि लगता है कि या तो मैं भरभराकर पानी में समा जाऊँ या फिर सारी आवाज़ों को बड़ी झील के हवाले कर दूँ …।

लोग कह रहे हैं कि अस्पताल की जाँच हो।
कोरोना इलाज की खुली जाँच हो।डेथ सेंटर बनने का आरोप लगा दिया।अरे जाँच करवा करवा के तो हम थक गए…कभी वन विभाग की जाँच, कभी राजस्व विभाग की जाँच, कभी ग्रीन ट्रिब्यूनल, कभी हाईकोर्ट, कभी ये कोर्ट, कभी वो कोर्ट … पर अब इतना झाग निकलने के बाद भी दाग बरक़रार है। अब ज़मीन की जाँच और इलाज की जाँच की आवाज एक साथ … हद हो गई। जैसे न्याय कलियुग में बचा ही न हो। करा लो भैया, जो जाँच बने सो करा लो। आरोप लगाने वाले चेहरे बदल रहे, हम तो अपनी जगह चट्टान की तरह खड़े। इलाज की बात है सो हर अस्पताल डेथ सेंटर बना दो या लाइफ़ सेंटर।ऐसा तो कोई अस्पताल नहीं होगा जहाँ गंभीर बीमारियों का इलाज होता हो और मरीज मरे न…।हमारी आत्मा का क्लेश हम ही समझ सकते, बाक़ी तो सब दर्शक हैं…दुखांत हो या सुखांत सब फ़िल्म देखकर चैन की नींद से जाएँगे। पर अब हमारी आत्मा तो चीख़ चीख़ के कह रही है कि हो जाए जो होना हो…हम तो रण में खड़े हैं, रणछोड़ नहीं हैं। या तो सुख से जीने दो या फिर जो बने सो एक बार में कर लो …।आख़िर नाम तो अंत में हमारा ही बदनाम हो रहा है कि जैसे चिरायु अस्पताल गुनहगार और बाक़ी सब इज़्ज़तदार। हम तो हर समय मानसिक त्रास झेल झेलकर मौत को न निगल पा रहे न उगल पा रहे।नाम हमारा बदनाम हो रहा और पूरी दुनिया हमारे मज़े ले रही है।और हम अपने मन की बात किससे कहें और सुनने वाला भी कौन है…। अंत में बस यही है कि हमें तो अपनों ने मारा ग़ैरों में कहाँ दम था…हमें वहीं बना दिया जहाँ झील का पानी बारिश में भी बहुत कम था…।

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