Arjun toh bohot hai,par Krishna kaha hai ….?? article Kaushal Kishore Chaturvedi

अर्जुन तो बहुत हैं , पर कृष्ण कहाँ हैं …?

कौशल किशोर चतुर्वेदी

प्रदेश की राजनीति के समुंदर में धर्म से रंगा एक छोटा सा कंकड़ ही क्यों न फेंक दिया जाए…राजनीतिक लहरें दो भागों में बँटकर ज्वालामुखी का रूप धारण कर लेती हैं।ज़्यादातर समय यह ज्वालामुखी ख़ुद बख़ुद शांत हो जाते हैं लेकिन कई बार नई बहस का जन्म हो ही जाता है।चूंकि मामला हाल ही में होने वाले विधानसभा उपचुनावों का है इसलिए मौक़ा कोई हाथ से जाने नहीं देना चाहता।बात चाहे राम की हो, हनुमान की हो या फिर कृष्ण की और अब अर्जुन की ही सही। राजनैतिक द्वंद युद्ध में कभी अखाड़े में तन पर माटी लपेटे एक योद्धा गरजता है तो कभी दूसरा योद्धा बरसता है लेकिन अंत तक जीत हार का फ़ैसला नहीं हो पाता। आश्चर्य की बात है कि परिणाम न तो किसी के पक्ष में होता है और न ही मैच टाई ही होता है।बल्कि दूसरे दिन का सूरज उगने के बाद फिर से किसी नए रूप में योद्धा मैदान में ही दिखते हैं।

मध्यप्रदेश में फिलहाल उपचुनावों के मद्देनज़र दोनों दलों के बीच अब निर्णायक लड़ाई हिंदुत्व के इर्द गिर्द केंद्रित हो गई है।चाहे राम की बात हो, हनुमान की बात हो या फिर कृष्ण-अर्जुन की बात हो। हनुमान भक्त के रूप में ख़ुद की छवि को देश दुनिया में परोस चुके पूर्व मुख्य मंत्री कमलनाथ ने मध्य प्रदेश में राजनीतिक खेमों में हिंदुत्व और सॉफ़्ट हिंदुत्व जैसे शब्दों को जीवंत कर दिया है। मुख्यमंत्री बनने के बाद कमलनाथ ने छिंदवाड़ा के सिमरिया स्थित उनके द्वारा स्थापित हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना की थी।इस सिद्धेश्वर हनुमान मंदिर में स्थित भगवान हनुमान की 101 फीट ऊँची आकाश-स्पर्श सबसे ऊँची मूर्ति है।इसके बाद उन्होंने राजधानी में धार्मिक पाठ आयोजित कर सबको चौंका दिया था। कांग्रेस सरकार गिरने के बाद राम मंदिर भूमि पूजन के समय हनुमान चालीसा का पाठ कर एक बार फिर उन्होंने धर्म में आस्था को प्रकट किया। और अब कृष्ण जन्माष्टमी पर अर्जुन वेशधारी उनके पोस्टर ने एक बार फिर नई बहस को जन्म दिया है।

पोस्टर का मज़मून यह है: मध्यप्रदेश के विकास के अर्जुन माननीय श्री कमलनाथ जी, पूर्व मुख्यमंत्री एवं अध्यक्ष मप्र कांग्रेस कमेटी की ओर से मप्र की जनता को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ – बधाई।और इसमें कमलनाथ को अर्जुन के वेश में भी खड़ा कर कांग्रेस ने सुनियोजित तरीक़े से भाजपा को शब्द वाण चलाने की खुली चिट्ठी भेज दी।

फिर भाजपा भी मैदान मारने से क्यों चूकती।विपक्ष के नेता के अर्जुन वाले पोस्टर पर गृह मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा ने चुटकी ली कि अर्जुन के समय सेना की ऐसी हालत नहीं हुई थी। फिर उन्होंने शायराना अंदाज में भी तंज कसा कि :
कभी सुंदरकांड करते हैं ,
कभी कृष्ण दरबार सजाते हैं।
कुछ लोग होते हैं ऐसे,
जो हालात देखकर बाजार लगाते हैं।

ख़ैर यह तो हुई राजनैतिक आमोद प्रमोद की चर्चा। पर इसके अलावा भी दोनों दलों के योद्धाओं की तरफ़ से आहुतियां देने का क्रम लगातार जारी रहता है। यह बयानबाज़ी मध्य प्रदेश में होने वाले 27 विधानसभा उपचुनावों के चलते धर्मयुद्ध और नीति-अनीति जैसे शब्दों के साथ हिंदुत्व को भी अपने दायरे में लेकर एक दूसरे का मुँह काला करने से भी बाज़ नहीं आती है।यह तो अच्छा ही है कि राम,कृष्ण और हनुमान की तरफ़ से सीधा कोई बयान आने की स्थिति बनने की कोई गुंजाइश नहीं है वरना किसी एक के पाले में खड़े होने और उसके पक्ष में बोलने की हिम्मत जुटाना उनके लिए भी आसान नहीं होता।
अर्जुन की बात चली तो सेना की बात भी सामने आयी लेकिन किसी की भी नज़र कृष्ण पर नहीं पड़ी। किसी ने भी यह नहीं सोचा कि अर्जुन जैसे धनुर्धार तो सभी दलों में हो सकते हैं।यदि अर्जुन और युद्ध की बात चली है तो पांडव पक्ष और कौरव पक्ष लड़ाई भी सामने आ सकती है। और यदि अर्जुन हैं तो कर्ण जैसे धुरंधर भी होंगे लेकिन युद्ध के निर्णायक कृष्ण की चर्चा करना कृष्ण जन्माष्टमी पर भी किसी ने ज़रूरी नहीं समझा। जबकि यह सबको मालूम है कि कर्ण और अर्जुन युद्ध जिताने वाले चेहरे नहीं है। युद्ध तो कृष्ण ही जिताएँगे।धर्म- अधर्म और नीति-अनीति का निर्धारण भी कृष्ण ही करेंगे।लेकिन वह कृष्ण कहाँ है? और किसके खेमे में हैं। कहीं कृष्ण जनता-जनार्दन के मन में रचे-बसे तो नहीं है? यदि दोनों दल इस बात पर सहमत हों तो मध्य प्रदेश में होने वाले उपचुनावों के परिणाम के बाद इस राज का ख़ुलासा हो ही जाएगा। लेकिन दोनों दल किसी एक बात पर जिस दिन सहमत होंगे, शायद लोकतंत्र का वह आख़िरी दिन ही होगा। सो कृष्ण कहाँ हैं, का प्रश्न हमेशा ज़िंदा रहेगा। पर यह बात तय है कि उपचुनावों के बाद धर्म-अधर्म, नीति-अनीति, राम,कृष्ण, हनुमान, अर्जुन और हिंदुत्व बहस का मुद्दा नहीं रहेंगे।

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