भारी पड़ा इंसान, क़ैद से आज़ाद हुए भगवान कौशल किशोर चतुर्वेदी

भारी पड़ा इंसान, क़ैद से आज़ाद हुए भगवान

कौशल किशोर चतुर्वेदी

आख़िरकार भगवान भी 80 दिन की कठोर क़ैद के बाद रिहा हो गए हैं। भगवान को क़ैद में रखने वाले वही इंसान थे जिन्होंने उन्हें भगवान का दर्जा दिया था यानि भगवान की कृपा पर पल बढ़ रहा इंसान। पर कोरोना के डर ने इंसान को इतना को इतना सताया, इतना डराया, इतना तड़पाया कि उसे भगवान को भी क़ैद करने का कड़ा फैसला भारी मन से करना पड़ा। और यहाँ तक मन को भारी करना पड़ा कि शराब की दुकानें पहले खोल दीं और कृपा बरसाने वाले भगवान के ठिकाने यानि मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे तब भी बंद रखे गए। तुलना जब मधुशाला और मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा की होने लगी तब जाकर मजबूर होकर भगवान की रिहाई का फैसला इंसान या कहें सरकारों को कलेजे पर पत्थर रखकर करना पड़ा।

पर इस पूरे घटनाक्रम में एक बात साबित हो गई कि इंसान अपने इंसानी मामलों में भले ही कितने भेदभाव से भरा रहे लेकिन भगवान के मामले में उसने कोई भेद नहीं किया। चाहे राम, कृष्ण, हनुमान के मंदिर हों या फिर बुद्ध, महावीर और अन्य भगवान के, चाहे अल्लाह को दिल से याद करने का ठिकाना मस्जिद हो, चाहे सारे गुनाह माफ करने वाले यीशु का घर चर्च हो या फिर गुरुवाणी का पवित्र स्थान गुरुद्वारा, सभी के साथ समानता का व्यवहार कर इंसान ने मिसाल पैदा कर दी। और क़ानून तोड़ने की हिम्मत खुदा के लिए खुदा के बंदों ने नहीं की तो बाक़ी मंदिरों के लिए भगवान के भक्तों ने नहीं की। यानि कलियुग में भगवान को भी यह अहसास हो गया होगा कि एक कोरोना की ओट में इंसान ने उसे उसकी हैसियत का पाठ पढ़ा ही दिया। सभी भगवान इस मामले में एक दूसरे से मिलकर या तो अपना दुख बाँट रहे होंगे कि इंसान ने जन्म जन्मांतर का हिसाब किताब एक झटके में ही चुकता कर दिया।अभी तक तो हम मानते थे कि जन्म देने के बाद इंसान को सबसे बड़ी सजा हम सुनाते थे लेकिन इस बार इंसान ने जता दिया कि सजा तो हम भी दे सकते हैं क़ैद की। उसी भगवान को जिसके नाम पर हम मारकाट मचा दें, इंसानियत तार-तार कर दें और नफ़रत के नए-नए कीर्तिमान गढ़ दें। या फिर सारे साकार-निराकार भगवान मिल बैठकर मुस्करा रहे होंगे कि आख़िर कोरोना के बहाने ही सही इंसान को अकल तो आई कि जब जान पर आएगी तो भगवानों के साथ बिना भेदभाव किए वह जीवन गुज़ार सकेगा।

खैर पोथी लिखने से कोई मतलब नहीं निकलेगा। अच्छी बात तो यह रही कि बिना मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा जाए नेक इंसान बनकर सभी क़ौम के लोगों ने ज़रूरतमंदों के लिए मदद के हाथ आगे बढ़ाए। धार्मिक स्थल खोलने के लिए किस ने आमरण अनशन भले न किया हो मगर खुद भूखे रहकर दूसरों की भूख की चिंता तो की ही है। शायद भगवान प्रार्थना स्थलों ने इसी नेकी का पाठ पकड़ाने के लिए खुद को क़ैद में करना बेहतर समझा।पर इसका असर अगर इंसानियत के बतौर स्थायी हो जाए तो ….भगवान इस बात को खुले मन से स्वीकार लेंगे कि वह इंसानों के दिल में है। इंसान उसे क़ैद कर उस पर लगातार भारी पड़ता रहे और वह बार-बार रिहा होकर और ज़्यादा ख़ुश होता रहेगा एक नेक गुनाहगार की तरह।

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