एक्सप्रेस पर सवार उपचुनावों की सियासत

एक्सप्रेस पर सवार उपचुनावों की सियासत
– चंबल फतह करने गडकरी फार्मूला पर कांग्रेस का पलटवार
कौशल किशोर चतुर्वेदी, भोपाल.
केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की वर्चुअल रैली में चंबल एक्सप्रेस वे का राग अब मध्यप्रदेश की सियासत में शीर्ष स्थान पर गूंज रहा है। चंबल एक्सप्रेस के जरिए भाजपा ने चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में 16 सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनावों में फतह का फार्मूला पेश किया है। यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस एक्सप्रेस वे का शुभारंभ गडकरी की मंशा के अनुरूप तीन महीने में करते हैं तो निश्चित तौर पर विधानसभा उपचुनावों से पहले यह भाजपा के लिए संजीवनी का काम करेगा, यह बात तय है। लेकिन कांग्रेस भी पलटवार कर एक्सप्रेस वे की सियासत में खुद को शामिल कर लिया है। ऐसे में अब विधानसभा उपचुनाव की सियासत जहां एक्सप्रेस वे से सीधे-सीधे जुड़ गई है तो दोनों ही दल इस पर सवार नजर आ रहे हैं।

गडकरी के गीत पर झूमी भाजपा –
मध्यप्रदेश में वर्चुअल रैली में गडकरी जब चंबल एक्सप्रेस वे का गीत गुनगुना रहे थे, तब प्रदेश के भाजपा नेता-कार्यकर्ता की आंखों में चंबल-ग्वालियर क्षेत्र की वह 16 विधानसभा सीटें एक-एक कर आगे बढ़ रही होंगी जिन पर उपचुनाव होना है। भिंड, मुरैना, ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, गुना सभी जिलों में चंबल एक्सप्रेस वे की गूंज सुनाई देगी। यही 16 विधानसभा सीटों की बढ़त किसी भी पार्टी को बाकी खेल में निर्णायक दौर में पहुंचा देगी। जिस तरह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का जो कथित आडियो वायरल हो रहा है और उसमें सुनाई दे रहा है कि मुख्यमंत्री बने रहने के लिए जीतना जरूरी है। फिलहाल विधानसभा उपचुनाव की एक-एक सीट अपने आप में यह दावा कर सकती है कि वह मध्यप्रदेश की सत्ता की निर्णायक सीट है। ऐसे में ग्वालियर चंबल की 16 सीटें सत्ता की चाबी साबित होने वाली हैं। गडकरी के गीत पर भाजपाई निर्णायक तौर पर तो तभी झूम पाएंगे जब इन सीटों पर उसका कब्जा होगा। पर उसके पहले मतदाताओं पर अपना असर डालने के लिए गडकरी का यह फार्मूला फिट हो सकता है।
कांग्रेस का पलटवार –
गडकरी का कहना है कि तीन महीने में यदि मध्यप्रदेश सरकार भूअर्जन का काम कर लेती है तो चंबल एक्सप्रेस वे का भूमिपूजन का रास्ता साफ हो जाएगा। कांग्रेस ने गडकरी के बयान पर पलटवार किया है। पूर्व पीडब्ल्यूडी मंत्री सज्जन सिंह वर्मा का कहना है कि चंबल एक्सप्रेस वे की फाइल कांग्रेस ने ही बढ़ाई है। फरवरी और जुलाई 2019 के महीने में वह न केवल गडकरी से मिले थे बल्कि फाइल को एप्रूव करने के लिए चीख चीख कर गुहार भी लगाई थी। खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी इसके लिए प्रयास किया था पर तब गडकरी के माथे पर जूं नहीं रेंगी थी। फिलहाल कांग्रेस ने बढ़त हासिल करने के लिए इन दो चिट्ठियों को ग्वालियर-चंबल के जिलों में रवाना कर दिया है ताकि भाजपा के भ्रम में आकर मतदाता चंबल एक्सप्रेस वे का श्रेय उसके खाते में न डाल दें। सियासत में जब दोनों दल आमने-सामने होंगे तो कांग्रेस यह साबित करने का कोई मौका नहीं छोड़ेगी कि भाजपा का चाल चरित्र चेहरा विकास का नहीं है बल्कि सत्ता हथियाने का है। जिस तरह कांग्रेस के विधायकों को बागी बनाकर प्रदेश की सत्ता हथियाई है और जिस तरह पहले केंद्रीय मंत्री ने चंबल एक्सप्रेस वे में रुचि नहीं ली, उसका हवाला देते हुए कांग्रेस ग्वालियर-चंबल एक्सप्रेस वे के जरिए सत्ता की सवारी करने का कोई मौका नहीं छोडऩा चाहेगी।

एक और एक्सप्रेस वे –
चंबल एक्सप्रेस वे के अलावा भोपाल-इंदौर एक्सप्रेस वे भी चर्चा में है। प्रदेश में 24 विधानसभा उपचुनाव होने हैं इसमें मालवा के जिलों में भी बाकी सीटें जीतने की चुनौती दोनों दलों के सामने हैं। भाजपा सरकार ने इस एक्सप्रेस वे को जिंदा कर इसके दोनों ओर क्लस्टर बनाकर औद्योगिक विकास के जरिए रोजगार देने का ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया है। चुनावों में इसका फायदा उठाने की कोशिश भाजपा की होगी तो कांग्रेस इस एक्सप्रेस वे में भाजपा सरकार को भ्रष्टाचार की रफ्तार पर सवार होने का आरोप लगा रही है। सज्जन सिंह वर्मा का आरोप है कि इस एक्सप्रेस वे के दोनों ओर भाजपाई मानसिकता के नौकरशाह, बिल्डर्स और भाजपा नेताओं की जमीनें हैं। इसलिए सरकार इसे बनाने में हजारों करोड़ की बर्बादी करना चाहती है। कांग्रेस सरकार ने इसकी जगह कम राशि में भोपाल-इंदौर रोड में ही दो लेन बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, जो कि एक हजार करोड़ में ही संभव हो जाता।

एक्सप्रेस बन गई सियासत –
कुल मिलाकर गडकरी के चंबल एक्सप्रेस वे का तीर छोडऩे के बाद अब मध्यप्रदेश की सियासत एक्सप्रेस बनकर मतदाताओं के दिमाग में अपनी जगह बनाने को आतुर है। फायदा किसको मिलेगा, यह तो समय और मतदाता के हाथ में है, पर दोनों ही दल फिलहाल आमने-सामने हैं। एक्सप्रेस वे तो महज एक है, उपचुनाव के अखाड़े में तीर तो कई चलने हैं। पर सत्ता का दरवाजा खोलने के लिए हर तीर बहुत गंभीर और निर्णायक भूमिका निभाएगा। इसमें एक्सप्रेस वे की सियासत को कम करके नहीं आंका जा सकता।

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